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जसवंत सिंह जैसा कोई जन्मे तो बताना !

जसवंत सिंह जैसा कोई जन्मे तो बताना !

-निरंजन परिहार
जसवंत सिंह चले गए। वे वर्तमान राजनीति के सबसे बुद्धिजीवी और प्रखर राजनेता थे। अटलजी की सरकार में वित्त, विदेश और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय इस भूतपूर्व सैनिक ने कोई यूं ही नहीं संभाल लिए थे। लेकिन राजनीति का दुर्भाग्य देखिए कि बीजेपी की स्थापना में जिनकी अहम भूमिका रही, जीवन भर बीजेपी में जिन्होंने औरों की उम्मीदवारियां निर्धारित की, उसी बीजेपी ने 2014 की मोदी लहर में उनके घोषित अंतिम चुनाव में भी टिकट काट दिया। और यह तो हद ही थी कि अटलजी, आडवाणीजी व बीजेपी के खिलाफ बकवास करनेवाले कांग्रेस के सोनाराम को बीजेपी से लड़ाया गया। निर्दलीय जसवंत सिंह चुनाव हारे, जीवन से भी हारे और राजनीति की गंदगी से भी। भले ही कुछ लोगों की आत्मा को जीते जी शांति मिल गई। लेकिन समूचे देश को निर्विवाद रूप से जिन नेताओं पर गर्व और गौरव होना चाहिए, उस गरिमामयी राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर जसवंत सिंह का नाम चमकीले अक्षरों में दमक रहा है।
जसवंत सिंह प्रभावशाली थे, शक्तिशाली भी और सामर्थ्यवान भी। वे आदमकद के आदमी थे और आदमीयत भी उनमें कोई कम नहीं थी। राजनीतिक कद के मामले में तो वे वैसे ही विराट व्यक्तित्व के राजनेता माने जाते थे। असल में, व्यक्तित्व उनका अगर विराट नहीं होता, तो राजस्थान के सपाट मरूस्थल से निकलकर हिमालय स्थित दार्जिलिंग के उंचे पहाडों में पहुंचे, तो जिन पहाड़ों से उनका जीवन में कभी कोई नाता नहीं रहा, वहां भी 2009 में लोगों ने उन्हें जिता कर संसद में भेजा और अपने हिमालय सी उंचाई बख्शी। लेकिन 2014 के चुनाव में सामने आई पतित राजनीति से उन्होंने मुंह मोड़ लिया, पार्टी ने भी नाता तोड़ दिया, तो फिर स्वास्थ्य ने भी उनका साथ छोड़ दिया और अंततः 27 सितंबर 2020 को उन्होंने संसार से ही विदाई ले ली।
दरअसल, पूरे विश्व के राजनायिक क्षेत्रों में जसवंत सिंह को एक धुरंधर कूटनीतिक के रूप में जाना जाता है। विदेशी सरकारों के सामने जसवंत सिंह की जो हैसियत रही, वह एसएम कृष्णा, नटवर सिंह और प्रणव मुखर्जी जैसे विदेश मंत्रियों के मुकाबले भी कई गुना ज्यादा बड़ी रही। फिर जसवंत सिंह के मुकाबले आज के विदेश मंत्री का नाम तो हमारे देश में ही कितने लोग जानते हैं, यह अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है। याद कीजिए, क्या नाम है अपने वर्तमान विदेश मंत्री का, जल्दी से याद भी नहीं आएगा। फिर, भारत की किसी भी पार्टी में विदेश के मामलों में उनकी टक्कर का कूटनीतिक जानकार हमारे हिंदुस्तान में तो अब तक तो पैदा नहीं हुआ। और राजनीतिक कद नापना पड़ जाए तो यह सच्चाई है कि आज की बीजेपी में तो खैर जसवंत सिंह के मुकाबले कोई टिकता ही नहीं। राजस्थान के जसोल में 3 जनवरी 1938 को जन्मे जसवंत सिंह 1980 में पहली बार संसद में पहुंचे तो कुल 9 बार सांसद रहे। भले ही पांच बार राज्यसभा और 4 बार लोकसभा के लिए चुने गए और लंबे कालखंड तक दिल्ली में ही रहे, लेकिन दिल में उनके हमेशा राजस्थान ही रहा।
देश के विपक्षी दलों में और दुनिया के भारत विरोधी देशों में भी जसवंत सिंह का सम्मान उतना ही था, जितना अपने दल में। उनकी सबसे बड़ी योग्यता यह भी थी कि घोर हिंदुवादी बीजेपी के दिग्गज नेता होने के बावजूद देश का मुसलमान उनमें एक धर्मनिरपेक्ष नेता को देखता था। लेकिन राजनीति का भी अपना अलग मायाजाल होता है। इसलिए यह बीजेपी का सनातन दुर्भाग्य है या उसके जन्मदाताओं की किस्मत का दुखद दुर्योंग, कि जो लोग जो कभी उनके दरवाजे की तरफ देखते हुए भी डरते थे, वे ही आज उन्हें आंख दिखा रहे हैं। फिर किस्मत की भी अपनी अलग नियती है कि बौने लोगों को जब महान लोगों की किस्मत लिखने का अधिकार उधार में ही सही मिल जाता हैं, तो वे नके प्रति कुछ ज्यादा ही क्रूर हो जाते हैं। राजनीति भले ही इसी का नाम होता होगा, लेकिन इतिहास उनको कभी माफ नहीं करता। इसीलिए, जसवंत सिंह के इस लोक से परलोक सिधारने के बाद भी उनकी गर्व, गौरव और गरिमा का मुकाबला करनेवाला आज इस देश में कोई नहीं है। जी हां कोई नहीं। क्योंकि आज के नेता सब कुछ अर्जित कर सकते हैं, लेकिन वह सहज सार्वजनिक स्वीकार्यता कहां से लाएंगे, जो जसवंत सिंह की असली पूंजी थी। इसीलिए यह स्वीकार करना ही होगा कि आज तो जसवंत सिंह के मुकाबले कोई और नेता देश में नहीं है, आगे कोई पैदा हो जाए, तो आपकी, हमारी और देश की किस्मत। फिर, राजस्थान के अब तक के सबसे बड़े नेता मोहनलाल सुखाड़िया व भैरोंसिंह शेखावत अब इस लोक में नहीं है, और कांग्रेस में जीते जी सबसे विराट हो चुके अशोक गहलोत मुख्यमंत्री के रूप में छाए हुए हैं। इन्हीं तीनों की तरह दिग्गज राजनेता के रूप में जसवंत सिंह सबके दिलों में हमेशा रहेंगे। उनके गौरव का आंकलन सिर्फ इतने भर से कर लीजिए कि जसवंत सिंह जैसा राजनायिक सम्मान व राजनीतिक गरिमा पाने के लिए आज की बीजेपी के नेताओं को कुछ जनम और लेने पड़ेंगे। फिर भी कोई जन्मे तो बताना!
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक है)

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