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Political

सत्ता की मलाई सबने मिलकर खायी

महाराष्ट्र महानगरपालिका चुनाव 2026 सत्ता संघर्ष

वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर

महाराष्ट्र में इन दिनों स्थानीय निकायों के चुनाव है. पहले चरण में नगरपरिषद के चुनाव हुये और अब 29 महानगरपालिका चुनाव हो रहे हैं लेकिन सत्ता की मलाई को लेकर इतनी मारपीट है कि कोई अपना नहीं और कोई पराया नहीं. मुंबई से सटे अँबरनाथ में एकनाथ शिंदे की पार्टी के ज्यादा कारपोरेटर आये लेकिन सत्ता बीजेपी को चाहिये थी तो कांग्रेस के ही 12 कारपोरेटर रातों रात बीजेपी में मिला लिये लेकिन दो दिन में शिंदे ने खेल पलट दिया और एनसीपी के चार कारपोरेटर तोड़ कर फिर से सत्ता हासिल कर ली .. एक और इलाके अकोट में तो बीजेपी ने उस एमआईएम से साथ मिलकर सत्ता हासिल कर ली जिसको वो दिन रात कोसती है.. कुल मिलाकर सबको सत्ता चाहिये बस विचारधारा चाहे जाये भाड़ में .

असल में केंद्र और राज्य में सत्ता पाने के बाद बीजेपी अब स्थानीय निकायों पर कब्जा करना चाहती है क्योंकि असल काम तो वहीं से होते हैं. बीजेपी के एक पूर्व सांसद जिनको बीजेपी ने अब किनारे पर कर दिया है वो कहते हैं कि सांसद औऱ विधायक से ज्यादा माल तो कारपोरेटर बनने पर मिलता है. आंकड़ों में ये बात सामने भी आ रही है. पिछली बार जीते कारपोरटरों ने जब इस बार चुनाव का डिक्लेरेशन दिया तो उनमें से कई की संपत्ति चार सौ से पांच सौ गुना बढ़ गयी . जानकार बताते है कि मुंबई महानगरपालिका का बजट 80 हजार करोड़ रुपये का है जो कुछ राज्यों के बजट से भी ज्यादा है और जब बजट ज्यादा होगा तो माल कमाने का मौका भी उतना ही मिलता है. कुछ पूर्व कारपोरटरों ने बताया कि बीएमसी में सबसे सही लोकतंत्र है जिसके जितने कारपोरेटर होते हैं उस पार्टी को हर काम में उतना प्वाइंट परसेंटेज मिल जाता है .इसके अलावा सभी कारपोरेटर अपने इलाके में होने वाले हर काम और बिल्डर से पैसा लेते हैं .इस तरह सब खुश रहते हैं. यही हाल सभी बड़ी महानगरपालिकाओं का है . ये लक्षमी देवी का ही असर है कि हर कोई महानगरपालिका में जान लगा देता है .

जहां तक बात गठबंधन की करें तो कोई नहीं बचा है. बीजेपी के गठबंधन महायुती मिलकर 29 महानगरपालिकाओं में से केवल 16 में गठबंधन पर है बाकी जगह अलग अलग लड़ रहे हैं. पिंपरी चिंचवड़ और पुणे में तो एनसीपी के चाचा भतीजे मिल गये और बीजेपी उनके खिलाफ लड़ रही हैं. बीजेपी ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो अजीत पवार ने कहा कि मुझ पर भी 70 हजार करोड़ करप्शन के आरोप लगे और जिन्होनें लगाये उनके साथ अब सत्ता में हूं . ये आरोप खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम देवेंद्र फणनवीस ने लगाये थे . उधर बीजेपी कई जगहों पर अपने सहयोगी और उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी को निपटाने में लगी है. सहयोगी रामदास आठवले को तो एक भी सीट नहीं दी गयी लेकिन उनको अप्रैल में राज्यसभा सीट और मंत्री पद बचाना है इसलिए चुप हो गये हैं.

उधर इंडिया गठबंधन भी तार तार हो गया है . मनसे से समझौता नहीं करने का बहाना करके लोकल कांग्रेसियों ने दवाब बनाया तो गठबंधन टूट गया . राज और उददव ठाकरे साथ आ गये और मराठी अस्मिता के सवाल पर साथ लड़ रहे हैं उधर कांग्रेस ने अकेले लड़ने का एलान किया लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पायी बाद में दिल्ली के दवाब में प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी को 62 सीटें दे दीं लेकिन वंचित ने एन वक्त पर 16 सीटों पर लड़ने से इंकार कर दिया तो कांग्रेस भी कुछ नहीं कर पायी और बीजेपी को इसका फायदा मिल रहा है. कांग्रेस ने भी अपनी करीब 157 सीटों पर जमकर खेल किया है और कई जगहों पर कांग्रेसी नेताओं ने अपने ही बेटा बेटी को टिकट देकर मामला सेट कर लिया है. उधर कांग्रेस मुंबई छोड़कर कुछ अन्य जगहों पर शिवसेना उदधव और मनसे के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है.कुल मिलाकर कोई नहीं बचा बस जीतने की उम्मीद और आगे मलाई मिलने की आशा में ताकत लगा रहे हैं .

सबने बीएमसी पर राज किया है इसलिए कोई एक दूसरे के खिलाफ बहुत कोई मुददा भी नहीं बना पा रहा है. शिवसेना के साथ बीजेपी भी लंबे समय तक सत्तता में रही तो कांग्रेस ने भी मलाई काटी है .उधर शहर का हाल ये कि मुंबई किसी अंतरराष्ट्रीय शहर तो छोड़िये पिछ़ड़े इलाकों की तरह गंदा लगता है. ठाकरे बंधु मिलकर जरुर मराठी का मुददा खेलने में कामयाब रहे हैं लेकिन बीजेपी शिवसेना शिंदे के पास अभी एक तुरुप का इक्का बाकी है . वो 15 जनवरी को चुनाव से ठीक एक दिन पहले सभी महिलाओं के खाते में लाड़की बहना योजना का दो महीने का पैसा यानि 3 हजार रुपये डालने वाले हैं. कांग्रेस ने इसके खिलाफ चुनाव आयोग में चिठठी दी है लेकिन चुनाव आयोग क्या करेगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव से सिर्फ जवाब मांगा है पैसा रोकने नहीं कहा . वैसे भी बिहार में जब बीच चुनाव में दस हजार रुपये मिलते रहे तो इसको कौन रोकेगा . बीजेपी और शिवसेना शिंदे को उम्मीद है कि एक दिन पहले दिया गया ये पैसा जमकर वोट दिलायेगा.

कुल मिलाकर लोग परेशान है कि विकसित भारत के सपने के बीच भी मुंबई में पानी ,सड़क ,सफाई और ट्रेफिक जाम जैसे मुददे उसे रोज रुलाते है लेकिन नेताओँ और पार्टिओं को बस सत्ता की पड़ी है. वैसे भी मुंबई में लोकल चुनाव में 50 से 55 प्रतिशत तक ही वोट होता है ऊपर से ये सब तमाशा देखकर बहुत से लोग वोट से दूर रहने का ही मन बना रहे हैं. अगर कम वोटिंग हुयी तो चुनाव में जीत का अँतर 200 से 1 हजार वोट तक हो सकता है और तब त्रिकोणीय लड़ाई में कई दिग्गज जीत और हार सकते हैं .वैसे 147 सीटों पर लड़ रही बीजेपी को उम्मीद है कि मुंबई की 227 कारपोरेटर वाली मुंबई बीएमसी पर उसका ही कब्जा होगा और वो एकनाथ शिंदे के साथ मलाई नहीं बांटना चाहती .बीजेपी इस बार राज्य मे य से ज्यादा सत्ता हासिल कर शत प्रतिशत भाजपा का नारा पूरा करना चाहती है. उधऱ एकनाथ शिंदे और अजित पवार खुद को खेल में बनाये रखने के लिए चुनाव लड़ रहे है तो उदधव ठाकरे की शिवसेना , राज ठाकरे की मनसे औऱ कांग्रेस के लिए अस्तित्व बचाये रखने का सवाल है.

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