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		<title>NDA Partner Ajit Pawar NCP critic to budget</title>
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		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Jul 2024 10:36:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[AJIT PAWAR]]></category>
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					<description><![CDATA[COMMENTING ON UNION BUDGET 2024-25 SHRI Y.P. TRIVEDI NATIONAL TREASURER OF N.C.P. AND EX-MEMBER OF PARLIAMENT SAID THAT HE WOULD GIVE THE BUDGET 8 OUT OF 10 MARKS. REDUCING THE FISCAL DEFICIT COMPARED TO LAST YEAR WHILE INCREASING THE CAPEX BY MORE THAN 1 LAKH CRORE IS A VERY ADMIRABLE...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>COMMENTING ON UNION BUDGET 2024-25<br />
SHRI Y.P. TRIVEDI NATIONAL TREASURER OF N.C.P. AND EX-MEMBER OF PARLIAMENT SAID THAT HE WOULD GIVE THE BUDGET 8 OUT OF 10 MARKS.<br />
REDUCING THE FISCAL DEFICIT COMPARED TO LAST YEAR WHILE INCREASING THE CAPEX BY MORE THAN 1 LAKH CRORE IS A VERY ADMIRABLE JOB.<br />
BUT ON THE TAXATION FRONT, THE FINANCE MINISTER IS NOT BOLD ENOUGH. THERE IS ONLY TINKERING IN INCOME-TAX BY CHANGING THE RATES IN SHORT-TERM AND LONG-TERM CAPITAL GAINS, OR CHANGES IN T.D.S. RATES, OR PERIOD OF RE-ASSESSMENT THESE ARE ONLY MINOR CHANGES, AS AGAINST THE NEED FOR COMPLETE REVAMPING OF DIRECT TAX CODE, AND REDUCING THE SLABS OF G.S.T. TO JUST 3 OR 4 SLABS, WHAT IS DONE IS ONLY MARGINAL HAIRDRESSING.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>बहुत कठिन है डगर चुनाव की भाजपा महाराष्ट्र की</title>
		<link>https://newsmantra.in/it-is-very-difficult-for-bjp-to-contest-elections-in-maharashtra/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Jul 2024 09:40:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[DEVENDRA FADNAVIS]]></category>
		<category><![CDATA[Eknath Shinde]]></category>
		<category><![CDATA[poliics]]></category>
		<category><![CDATA[Shivsena]]></category>
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					<description><![CDATA[-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार कई बार महाराष्ट्र के लोग कहते हैं कि महाराष्ट्र से ही राष्ट्र चलता है और इस बार के विधानसभा चुनाव सही मायनों में ऐसे ही साबित होंगे क्योंकि ये लोकसभा में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद होने वाले पहले चुनाव है . दीवाली...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong><br />
कई बार महाराष्ट्र के लोग कहते हैं कि महाराष्ट्र से ही राष्ट्र चलता है और इस बार के विधानसभा चुनाव सही मायनों में ऐसे ही साबित होंगे क्योंकि ये लोकसभा में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद होने वाले पहले चुनाव है . दीवाली के आसपास होने वाले इन चुनावों में तय होगा कि किसके घर दिया जलेगा या कहां अंधियारा होगा . बहरहाल सबसे बड़ा स्टेक या दांव पर लगी साख भाजपा की है क्योंकि यही इकलौता राज्य हैं जहां से भाजपा का उदय 1980 में पहली बार हुआ था और उसी समय से उसकी सहयोगी रही बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना को भाजपा ने छोड़ दिया .<br />
प्रयोगशाला बना महाराष्ट्र .<br />
महाराष्ट्र देश का इकलौता ऐसा राज्य बन गया है जहां पर पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा राजनीतिक प्रयोग हुये . यहीं पर बीजेपी शिवसेना का गठबंधन टूटा फिर अचानक सुबह पांच बजे शपथ ग्रहण समारोह हुआ फिर 24 घंटे में सरकार गिर गयी कुछ दिन मे एनसीपी कांग्रेस और उदधव ठाकरे की शिवसेना की सरकार बनी दो साल बाद शिवसेना में सबसे बड़ी टूट हुयी और एक नई शिवसेना बनी जिसको धनुष बाण का चुनाव चिंह भी मिल गया . वहीं शरद पवार की एनसीपी भी टूटी और भतीजे अजीत पवार को भी चाचा का चुनाव चिन्ह घड़ी मिल गया लेकिन पहले टेस्ट यानि लोकसभा चुनाव ने सबसे बड़ा संदेश यही दिया कि लोगों को ये तोड़फोड़ की राजनीती पसंद नहीं आयी इसलिए बीजेपी के लोकसभा सदस्यों की संख्या 21 से घटकर नौ पर आ गयी और जिस कांग्रेस के केवल एक लोकसभा सदस्य थे वो 14 तक पहुंच गयी . लोकसभा के परिणामों ने भाजपा को हिला दिया है और अब भाजपा को तय करना है कि वो कैसे वापसी घरेगी सत्ता में भी और लोगों के दिलों में भी ..<br />
सीट बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती .<br />
भाजपा के महायुति गठबंधन की सबसे बडी चुनौती सीटों के बंटवारे की है . 288 सीटों वाली विधानसभा मे अब तक भाजपा और शिवसेना ठाकरे आधी आधी या कभी कभी 171 और 121 सीट पर लड़ते रहे है. दोनों को कभी तकलीफ भी नहीं हुया लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा ने शतप्रतिशत भाजपा का नारा दिया और ठाकरे की शिवसेना को कमजोर किया उसके बाद उनके रास्ते अलग हो गये .अब सबसे मुश्किल सवाल यही कि महायुति में बंटवारा कैसे हो . भाजपा के पास अभी खुद के 103 और इंडिपेंडेंट 10 मिलाकर कुल 113 विधायक है .बीजेपी कम से कम 180 सीट पर चुनाव लड़ना चाहती है ऐसे में उसके दो सहयोगी शिवसेना शिंदे और एनसीपी अजित पवार के हिस्से में कुल बची 100 सीटों में से अधिकतम 50 –50 ही आ सकती है . लेकिन शिंदे के पास खुद के अभी 54 विधायक है तो अजित पवार के पास 44 विधायक है . तीनों पार्टियां उन जगहों को भी चाहती है कि जहां उनके उम्मीदवार नंबर दो पर थे . अब इसका तोड़ निकालना बड़ा कठिन होगा ..लोकसभा में भी खींचतान हुयी और एकनाथ शिंदे 14 सीट लेने में कामयाब रही वहीं अजित पवार 4 सीट पर ही लड़े इसलिए बीजेपी को राहत मिली लेकिन विधानसभा में अब शिंदे कम से कम 100 और अजित पवार भी 100 सीट मांग रहे हैं .इसको हल करना बड़ा कठिन है .<br />
उधऱ दूसरी तरफ महागठबंधन में भी खींचतान है लेकिन सभी दल 96..96 सीट लड़ने लगभग तैयार इसलिए बात बन सकती है कुछ सीटों पर अदला बदली होगी.<br />
अजित पवार बोझ या मददगार ..<br />
लोकसभा चुनाव में तो अजित पवार केवल एक सीट जीत पाये और उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार हार गयी इसलिए सवाल उठने लगा कि भाजपा आगे भी अजित पवार को साथ रखेगी या नहीं . अजित पवार को लेकर भाजपा का कैडर नाराज है उनको लगता है कि पवार पर करप्शन के आरोप रहे है और उनको लेने के बाद भाजपा के कैडर का मानना है कि अब बीजेपी किस मुंह से करप्शन की बात करेंगे . अमित शाह ने भी शरद पवार को करप्शन का सरगना कहा तो सवाल उठ गया कि अजित पवार को क्यों रखा जा रहा है . भाजपा की कोर ग्रुप में भी सवाल उठा और संघ से प्रेरित पत्रिका विवेक ने भी लिखा कि अजित पवार बोझ बन गये हैं .<br />
ऐसे में अब क्या अजित पवार बाहर जायेंगे लेकिन लोकसभा के रिजल्ट के बाद भाजपा ये मैसेज नहीं देना चाहती कि उसने किसी सहयोगी को छोड़ दिया भले ही उसका एक लोकसभा मेंबर है .इसलिए अजित पवार भाजपा की मजबूरी बन गये है .अजित पवार भी भाजपा के साथ ही रहना चाहते हैं उनका फैसला विधानसभा चुनाव के बाद ही होगा .<br />
भाजपा की आपसी खींचतान ..<br />
सहयोगी दलों के साथ साथ भाजपा की राज्य इकाई में जमकर खींचतान है .एक तरफ देवेंद्र फणनवीस किसी तरह फिर से सीएम बनना चाहते हैं तो दूसरी तरफ विनोद तावड़े .आशीष शैलार पंकजा मुंडे सब उनके विरोधी माने जाते हैं. राज्य भाजपा में दो गुट है एक जो संघ और पीएम मोदी के वफादार है और दूसरे जिन पर अमित शाह का हाथ है इसकी साफ झलक लोकसभा चुनाव में दिखी और अब विधानसभा में भी भाजपा किसी एक चेहरे को आगे नहीं रख सकती .भाजपा की इसी खींचतान के चलते केंडिडेट सिलेक्शन से लेकर प्रचार तक हर जगह कैडर में भ्रम दिखाई देता है और उसी का असर वोट पर भी होता है. हालांकि अश्विनी वैष्णव और भूपेंद्र यादव को भेजा गया है पर उनका झुकाव फणनवीस की तरफ ज्यादा दिखाई देता है.<br />
एम फैक्टर का असर ..<br />
लोकसभा चुनाव की तरह ही विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को एम फैक्टर यानि मराठा .मुस्लिम और महार यानि दलित विरोध का सामना करना होगा . मराठा आरक्षण चाहते है मुस्लिम तो बीजेपी विरोधी है महार यानि दलित को संविधान से छेड़छाड़ का मुददा सताता रहा है .लोकसभा में तीनों ने महागठबंध का साथ दिया जिससे कांग्रेस को सबसे ज्यादा फायदा हुआ लेकिन विधानसभा में इसे बीजेपी को तोड़ना होगा तभी बात बनेगा .. राज्य में मराठा करीब 22 फीसदी मुस्लिम करीब 13 फीसदी और महार यानि दलित करीब 12 फीसदी है . आदिवासी भी भाजपा के साथ इस बार नहीं दिख रहे ..<br />
ओबीसी ही सहारा है ..<br />
भाजपा को महाराष्ट्र में अब तक मिली सफलता के बीजेपी संघ का माधव फार्मूला ही रहा है जिसमें म यानि माली ध यानि धनगर और व यानी वंजारा समाज रहा है . गोपीनाथ मुंडे एकनाथ खडसे जैसे दिगगज नेताओं के कारण ओबीसी हमेशा से भाजपा के साथ रहा है क्योंकि वो राज्य में मराठा वर्चस्व को तोड़ना चाहता है लेकिन भाजपा ने इस ओबीसी को बचाने के लिए बहुत कुछ नहीं किया .इसलिए अब ओबीसी में बिखराव दिख रहा है . माली वोटर अब छगन भुजबल के साथ है . धनगर बंटा हुआ है और उसके सबसे बड़े नेता महादेव जानकर लोकसभा का चुनाव हार गये वहीं पंकजा मुंडे के कारण वंजारा समाज नाराज है .भाजपा को इन सबको साधना है तो यूपी की तरह ही छोटी जातियों और उनके नेताओं को अपने साथ लाकर टिकट देना होगा.<br />
क्षेत्रीय और छत्रप की चुनौती .<br />
महाराष्ट्र में मोटे तौर पर पांच इलाके माने जाते है विदर्भ ,मराठवाड़ा , पश्चिम महाराष्ट्र .उत्तर महाराष्ट्र यानि खानदेश और मुंबई सहित कोंकण किनार पटटी . इन सब इलाकों में इस बार भाजपा को निराशा हाथ लगी जबकि विदर्भ और उत्तर महाराष्ट्र को भाजपा का गढ माना जाता है.इसके साथ ही महाराष्ट्र में 13 बड़े शहर है और भाजपा की इन पर पकड़ रही है लेकिन इन सबको अब साधना होगा .<br />
बात विदर्भ से करते हैं. विदर्भ की 11 लोकसभा सीट में से भाजपा को इस बार केवल एक सीट ही मिल पायी . वो भी इसलिए कि नागपुर से नितिन गड़करी चुनाव मैदान में थे और उनके सामने कांग्रेस का उम्रृमीदवार कमजोर था . विदर्भ में मुस्लिम और कुनबी बड़ी संख्या में है कुनबी तो करीब 26 फीसदी है जो नाना पटोले के कारण और भाजपा की बेरुखी के कारण कांग्रेस के साथ चला गया . उसके अलावा दूसरी बड़ी जाति हलबा कोष्टी भी चंद्रपुर में भाजपा के खिलाफ चली गयी . भाजपा के साथ केवल चार फीसदी वाली कोमटी ही गये . बीजेपी को पिछले चुनाव में विदर्भ की 62 सीटें में से 29 सीट मिली थी जबकि कांग्रेस को केवल 15सीट मिली थी लेकिन इस बार ये मामला उलट सकता है.<br />
मराठवाड़ा की बात करें तो भाजपा ने यहां अपनी जडे जमाने में कामयाबी हासिल की थी लेकिन लोकसभा में मराठा आरक्षण के सवाल और देवेंद्र फणनवीस बाह्मण के विलेन बनने के कारण भाजपा का पत्ता साफ हो गया यहां तक कि अशोक चव्हाण जैसे दिग्गज नेता के आने के बाद भी कांग्रेस कमजोर नहीं हुयी और चव्हाण की नांदेड़ सीट पर भी कांग्रेस जीत गयी . अब भाजपा को यहां संभलना होगा . वैसे ये कांग्रेस और एनसीपी का गढ रहा है . पर विधानसभा चनाव में यहां की 46 सीट में से भाजपा को 16 और तब की शिवसेना को 12 सीट मिल गयी थीं कांग्रेस तब यहां 8 पर सिमट गयी थी .<br />
पश्चिम महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण और मुस्लिम सबसे बड़े फैक्टर है मराठा आरक्षण के कारण बीजेपी विरोध दिख रहा है और मराठा ज्यादातर शरद पवार के साथ है . यहां तक कि अजित पवार की पत्नी भी इसलिए हार गयी और अब अजित पवार की साख दांव पर है. अजित पवार हारे तो भाजपा महायुति को उतनी सीटों का भी नुकसान होगा.<br />
उत्तर महाराष्ट्र में भाजपा ने कांग्रेस के बड़े नेता विखे पाटिल को तोड़ा लेकिन मराठा आरक्षण और किसानों की नाराजगी के चलते खुद विखे पाटिल के बेटे लोकसभा का चुनाव हार गये . शिकायत है कि भाजपा ने खुद ही बाहर से आये मराठा नेताओं को कमजोर किया अब भाजपा को प्याज के किसानों की नाराजगी और बारिश के कारण फसल के नुकसान का मुददा भी देखना होगा . यहां भाजपा अब भी ओबीसी वोट साधकर खुद को बचाकर रख सकती है.<br />
मुंबई कोंकण में भाजपा को चुनौती है कि ये शिवसेना और बाल ठाकरे का गढ़ है और आम मराठी मतदाता की सहानुभूति उदधव ठाकरे के साथ है .यहां पर भाजपा सबसे ज्यादा विधायक वाली पार्टी है लेकिन अब लोकसभा में उसका एक ही उम्मीदवार जीत पाया और स्कोर 6 सीट में 4 और 2 का रहा . ऐसे में भाजपा को मुंबई की 36 और ठाणे की 24 विधानसभा सीटों में ज्यादा से ज्यादा जीतनी होगी लेकिन यहां पर भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना की आपसी खींचतान को संभालना होगा .<br />
मोदी फैक्टर नहीं .लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में मोदी फैक्टर नहीं चला मोदी ने चुनावी महीनो में कुल 23 सभायें की जिनमे से 19 पर लोकसभा की सीटें भाजपा हार गयी . विधानसभा चुनाव में वैसे भी डबल इंजन का मुददा अब नहीं चलने वाला.इसलिए भाजपा ने बजट में एमपी की तरह लाड़ली बहना ही नहीं लाड़ला भाई और बेरोजगार भत्ता .किसानों को फ्री बिजली जैसी रेवड़ी बांटना शुरु कर दिया है लेकिन इनका कितना असर होगा अभी नहीं कहा जा सकता .<br />
बीजेपी के सामने महाराष्ट्र में एक नही कई चुनौतियां है लेकिन समय रहते सुधार किया तो बहुत कुछ बदल सकता है सबसे पहला काम भाजपा को अपने कैडर को सदमे से निकालकर फिर से काम पर लगाना है और दूसरा जातिगत समीकरण संभालते हुए काम करना है तभी वापस लौटेंगे .<br />
मेरा अनुमान आज की स्थिति कौन कितने पर मजबूत<br />
भाजपा 58 से 72 पर</p>
<p>एकनाथ शिंदे शिवसेना 22 से 30 पर<br />
अजित पवार एनसीपी 12 से 17 पर<br />
कांग्रेस 52 से 62 पर<br />
उदधव ठाकरे 48 से 55 पर<br />
शऱद पवार एनसीपी 22 से 32पर<br />
निर्दलीय कम से कम 18 पर</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कांग्रेस का भविष्य नहीं वर्तमान खराब है</title>
		<link>https://newsmantra.in/congresss-present-is-bad-not-its-future/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Mar 2024 07:24:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[bhupendra hoodha]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[CONGRESS]]></category>
		<category><![CDATA[karnataka]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
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					<description><![CDATA[इन दिनों हर कांग्रेसी नेता ये पूछ रहा है कि कांग्रेस में रहकर क्या फायदा . क्या ये पार्टी रहेगी या नहीं और कांग्रेस का कोई भविष्य है या नहीं . असल में ये वर्तमान से उपजा निराशावाद है जो कांग्रेसी नेताओं को आगे नहीं देखने दे रहा है ....]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>इन दिनों हर कांग्रेसी नेता ये पूछ रहा है कि कांग्रेस में रहकर क्या फायदा . क्या ये पार्टी रहेगी या नहीं और कांग्रेस का कोई भविष्य है या नहीं . असल में ये वर्तमान से उपजा निराशावाद है जो कांग्रेसी नेताओं को आगे नहीं देखने दे रहा है . लगातार दस साल सत्त्ता से बाहर रहने के बाहर कांग्रेसी नेता छटपटाने लगे हैं उनको लगने लगा है कि एकाध बार और तो वो इंतजार कर सकते है लेकिन अगर आगे भी ऐसा ही रहा तो .ऊपर से बीजेपी का अगले 25 साल तक राज करने का नारा उनको और भी घबरा देता है. लेकिन असल जमीनी हकीकत देखें तो कांग्रेस का वर्तमान जरुर खराब है लेकिन भविष्य नहीं.ऐसे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अपने कैडर को ये समझाना होगा कि अभी भली है पार्टी सबसे निचले पायदान पर है लेकिन आगे भविष्य ठीक होगा.</p>
<p>कांग्रेस के रणनीतिकार ये मानते है कि अभी लीडरशिप खुद भी तय नही कर पा रही है कि इसी बार मोदी को हराया जाये या अगले बार तक मोदी के जाने का इंतजार किया जाये. राहुल गांधी और उनके करीबी मानते है कि अभी लड़ाई लंबी और विचारधारा की है सत्ता में आने की राहुल को कोई जल्दबाजी नही हैं. उनको लगता है कि विचारधारा की लड़ाई पर कायम रहो जल्दी ही जब भी लोग बीजेपी से ऊबेंगे या मोदी की लीडरशिप कमजोर होगी तो मौका कांग्रेस को ही मिलेगा. वैसे उनकी बात में दम भी है क्योंकि खुद बीजेपी के नेता मानते है कि इसी बार बहुत चुनौती है भले ही नारा 400 पार का हो लेकिन जमीन पर अब बीजेपी के अंदर ही और बाहर भी विरोध होने लगा है. बीजेपी के नेता भी ये सवाल उठाने लगे है कि बाहर से आये लोगों को तरजीह दी जा रही है उनको नहीं. अगर इस बार बीजेपी और उसके सहयोगी 400 का आंकड़ा पार नहीं करते या बहुमत से दो कदम भी पीछे रह जाते है तो फिर उनकी विश्वसनीयता मे तेजी से कमी आयेगी. कांग्रेस जीत सकती है कुछ ज्यादा सीटें .</p>
<p>अभी कांग्रेस की रणनीति बनाने में लगे लोगों को लगता है कि किसी भी हालत में इस बार कांग्रेस की सीटें कुछ बढ़ सकती है और ये आंकड़ा 80 तक पहुंच सकता है. कांग्रेस के नेताओं को कर्नाटक,तेलंगाना. आंध्रप्रदेश . महाराष्ट्र और बिहार से कुछ बढ़त की उम्मीद है साथ ही मध्यप्रदेश ,राजस्थान . उत्तरप्रदेश और छत्तीसगढ़ में एक से तीन सीट का इजाफा हर राज्य में मिलने की उम्मीद है . इसलिए कांग्रेस को लगता है कि अब उसके पास खोने को कुछ नही पाने को ही . हालांकि अब भी कई राज्यों में करीब 30 से 35 विधायक और इतने ही बड़े नेता बीजेपी जाने को तैयार है इसलिए पार्टी को संवाद बढ़ाना होगा और इन नेताओं को समझाना होगा कि बीजेपी में अब वैकेंसी नहीं है और वहां जाकर कुछ मिलने वाला नही है .जो नेता लड़ने तैयार है उनको रोकना चाहिये .<br />
कांग्रेस में जेनरेशन चेंज .</p>
<p>ये ऐसा आखिरी चुनाव है जिसमें कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी रहेगी उसके बाद दूसरी और तीसरी यानि नई पीढ़ी के लोग आ जायेंगे . तब कमलनाथ .अशोक गहलोत , भूपेंद्र हुडडा , मुकुल वासनिक और मधूसूदन मिस्त्री जैसे पुराने लोग हट जायेगें और वही बचेंगे जो लड़ पायेंगे . ये सच है कि देश में आज भी लोगों में कांग्रेस का आधार बचा हुआ है. अब भी उसके पास कम से कम तीन सरकारें तो है ही और आगे भी आ सकती है. ऐसे में पार्टी में कैडर का भरोसा बनाये रखना जरुरी है. पार्टी को नेगेटिव बातों से हटकर सारे कैडर को साथ लेकर और हर राज्य में किसी एक के बजाय सामूहिक नेतृत्व पर काम करना होगा तो आगे जाकर कुछ तस्वीर बदल सकती है.<br />
एक बात जरुर याद रखें परिवर्तन ही संसार का नियम है कोई भी स्थाई नहीं है राजनीति में तो बिल्कुल भी नहीं इसलिए लंबी रणनीती पर काम हो और नयी लीड़रशिप बनायी जाये तो कुछ बदल सकता है.</p>
<p><strong>-संदीप सोनवलकर </strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मराठा वोट बैंक अब बंट गया कई खानों में फायदा बीजेपी को मिलेगा</title>
		<link>https://newsmantra.in/maratha-vote-bank-is-now-divided-into-many-mines-bjp-will-get-benefit/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Mar 2024 08:15:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[CONGRESS]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[MAHARASHTRA]]></category>
		<category><![CDATA[maratha]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[VOTES]]></category>
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					<description><![CDATA[महाराष्ट्र बनने के बाद से ही राज्य की राजनीति को कंट्रोल करने वाले मराठा वोट बैंक में सेंध लग गयी है और अब मराठा वोटर इतना भ्रम में है कि उसे समझ नहीं आ रहा है कि नेताओं के साथ जाये या अलग से अपना भला सोचे . इसका सीधा...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>महाराष्ट्र बनने के बाद से ही राज्य की राजनीति को कंट्रोल करने वाले मराठा वोट बैंक में सेंध लग गयी है और अब मराठा वोटर इतना भ्रम में है कि उसे समझ नहीं आ रहा है कि नेताओं के साथ जाये या अलग से अपना भला सोचे . इसका सीधा फायदा बीजेपी को लोकसभा चुनाव में मिलेगा क्योंकि अब तक मराठा वोट परंपरागत तौर पर कांग्रेस या शरद पवार की एनसीपी के साथ ही रहा है लेकिन अब करीब 28 फीसदी ये वोट कई खानों में बंट गया है.</p>
<p>असल में बीजेपी का हमेशा से ये प्रयोग रहा है कि महाराष्ट्र में मराठों के मजबूत वर्चस्व को तोड़ने के लिए माधव फार्मूला यानि माली धनगर और वंजारी सारे ओबीसी को एक साथ लाया जाये और मराठा बनाम ओबीसी को तेज किया जाये जिससे मराठा अगर एक तरफ जायें तो पूरा ओबीसी बीजेपी के साथ आ जाये .इसका फायदा बीजेपी को 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला भी लेकिन अब बीजेपी उससे एक कदम आगे बढ़ गयी है. राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि संघ की सलाह पर बीजेपी ने मराठा वोट बैंक को ही अब कई खानों में बांट दिया है. एकनाथ शिंदे के तौर पर मराठा सीएम बनाकर पहले तो शिवसेना का वोट बैंक तोड़ा फिर कुछ दिन बाद अजित पवार को लेकर शरद पवार के मराठा वोट बैंक में सेंध लगा दी.</p>
<p>इतना ही नहीं दूसरी तरफ जब मराठों ने अपने राजनीतिक वजूद की ताकत दिखाने के लिए मराठा आऱक्षण का आंदोलन शुरु किया तो पहले तो मराठों को कुनबी यानि ओबीसी और गैर कुनबी में बांट दिया . इस आंदोलन को लेकर मनोज जरांगे नाम का एक मराठा युवक बहुत लोकप्रिय हुआ उसके पीछे पूरा समाज खड़ा दिखाई दिया लेकिन सरकार ने उसकी कुछ मांगे मानी कुछ नहीं और आखिर में मराठा आरक्षण का केवल प्रस्ताव विधानसभा में पास कर दिया तो अगले ही दिन मनोज जरांगे को भी शब्दजाल में फंसा कर डिसक्रेडिट कर दिया . मजबूरन मनोज जरांगे को अपना आंदोलन बीच में ही छोड़ना पड़ा . इससे पूरा मराठा समाज निऱाश है .<br />
दूसरी तरफ छगन भुजबल की लीडरशिप में ओबीसी ने बिना कुछ हिंसा के अपना अधिकार बचाये ऱखने के लिए जमकर दवाब बनाया और सरकार को मजबूर किया कि वो मराठों को ओबीसी में शामिल करने के बजाय अलग से आरक्षण दे जबकि पचास प्रतिशत की सीमा के चलते जातिगत आधार पर अलग से ये आरक्षण देना कानूनी तौर पर नहीं टिकेगा . अब ओबीसी को संदेश साफ है कि इतना बड़ा आंदोलन करके भी मराठा समाज को कुछ नहीं मिला.</p>
<p>इस सबसे मराठा नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है इसलिए वो मजबूरी में ही सही लेकिन किसी भी हालत में बीजेपी के साथ जाने तैयार नही है. उनका वोटर इसके लिए तैयार नहीं लेकिन नेताओं को खुद को बचाना है इसलिए वो बीजेपी के साथ जाकर मोदी लहर में ही जीतना चाहते हैं. कांग्रेस के अशोक चव्हाण जैसे दिग्गज नेता भी इस मोह से नहीं बच पाये और बीजेपी चले गये . और भी करीब 15 मराठा नेता एक एक करके बीजेपी का दामन थाम रहे हैं. उधर शरद पवार की ये आखिरी पारी है सो वो कितना मराठा वोट ले पायेंगे ये तो चुनाव में ही पता चल पायेगा लेकिन उनके ही परिवार में फूट पड़ गयी है . बेटी के खिलाफ ही पवार परिवार की बहू लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती है.</p>
<p>महाराष्ट्र के इतिहास पर नजर डालें तो मुगल काल और आदिलशाही में यही हुआ था मराठा अपने घर और वतनदारी को बचाने के लिए अलग अलग खेमें में बंटे हुए थे और बाहरी राज कर रहे थे तब सोलहवी सदी के अंत में मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठों के मतभेद खत्म कर एक साथ किया और स्वराज्य की बात की लेकिन अब इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है. मराठा अब तक सत्ता पर हावी रहे हैं .एक या दो बार को छोड़कर मराठा ही मुखयमंत्री बनता है और राज्य की सहकारी चीनी मिलों से लेकर शिक्षण संस्थानों तक पर उनका ही राज रहा है लेकिन अब ये पकड़ छूट रही है . अगर मराठों की राजनीतिक ताकत कम हुयी तो इसका खामियाजा पूरे समाज पर होगा .</p>
<p><strong>-संदीप सोनवलकर </strong></p>
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		<title>दोस्त दोस्त ना रहा .. क्यों भाग जाते हैं राहुल के दोस्त</title>
		<link>https://newsmantra.in/friends-are-no-longer-friends-why-do-rahuls-friends-run-away/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Jan 2024 06:56:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[CONGRESS]]></category>
		<category><![CDATA[MILIND DEORA]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[RAHUL GANDHI]]></category>
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					<description><![CDATA[-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार सन 2004 से ही राहुल गांधी के करीबी दोस्त रहे और कई बार राहुल को विदेशी विश्वविघालयों में लेक्चर के लिए साथ ले जाने वाले पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा अब उसी दिन पार्टी छोड़कर चले गये जिस दिन से राहुल गांधी असल में 2024 के लोकसभा...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong><br />
सन 2004 से ही राहुल गांधी के करीबी दोस्त रहे और कई बार राहुल को विदेशी विश्वविघालयों में लेक्चर के लिए साथ ले जाने वाले पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा अब उसी दिन पार्टी छोड़कर चले गये जिस दिन से राहुल गांधी असल में 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रचार का शंखनाद भारत जोड़ों न्याय यात्रा 2.0 की शुरुआत मणिपुर से कर रहे थे .<br />
मिलिंद तो शुक्रवार को ही शामिल हो रहे थे लेकिन एन टाइम पर प्रोग्राम टाल दिया गया क्योंकि रणनीतिकारों ने तय किया कि कांग्रेस को ये झटका उसी समय दिया जाये जबकि राहुल की यात्रा की दूसरी शुरुआत हो रही . ताकि मीडिया को भी कांग्रेस की आलोचना करने का मौका मिल जाये. मिलिंद भी मजबूरी में ही सही इसके लिए तैयार हो गये और जाते जाते कह भी गये कि कांग्रेस में अब उनकी कोई नहीं सुनता ..हालांकि ये सवाल जरुर पूछा जाना चाहिये कि सन 2004 में पहली बार सांसद और उसके बादा 2009 से मंत्री बनने वाले मिलिंद ने राहुल गांधी के साथ ही संसदीय सफर शुरु किया था और राहुल के करीबी होने का खूब फायदा भी उठाया था . किसको इतनी कम उम्र में सांसद होने का फायदा मिलता है और मंत्रालय भी मिला. पिता मुरली देवड़ा तो खैर कारपोरेटर से सांसद और मंत्री तक गये मिलिंद को पिता के नाम के कारण ही सब कुछ मिला.<br />
इधर जब 2014 और 2019 की लगातार दो हार के बाद से ही मिलिंद के सुर बदल गये .वो दिल्ली से दूर हो गये और राहुल के साथ भी उनके विदेश दौरे कम हो गये .हालांकि मिलिंद को प्रोफेशनल कांग्रेस का सह प्रमुख बनाया गया था शशि थरुर के साथ लेकिन मिलिंद इससे खुश नहीं थे बाद में ट्रेजरर भी सह प्रमुख ही बनाया गया उसके बाद मिलिंद ने नागपुर में नेताओं से बात करने की कोशिश की लेकिन बहुत भाव नहीं मिला तभी 28 दिसंबर को मिलिंद ने तय कर लिया था कि अब यहां नहीं रहना .. अब वो एकनाथ शिंद के साथ चले गये हैं. मिलिंद को इसके पहले 2014 में ही अरुण जेटली जी ने बीजेपी आने का न्यौता दिया था और तब मिलिंद चले जाते तो बेहतर होता लेकिन राहुल की दोस्ती के चलते नहीं गये .<br />
अब सवाल यही उठता है कि ऐसा क्या होता है कि राहुल गांधी के ही सारे करीबी और दोस्त एक एक करके उनको छोड़ जाते है. क्या राहुल को दोस्तों की सही पहचान नहीं है या फिर राहुल तो सही है उनको दोस्त ही कुछ ज्यादा उम्मीद कर लेते हैं. चाहे ज्योतिरादित्य सिंधिया हो या जितिन प्रसाद या फिर आर पीएन सिंह या अब देवड़ा सब तो राहुल के खास रहे हैं एक और मित्र रणनीतिकार प्रशांत किशोर को भी राहुल ने खूब सिर चढाया था वो भी छोड़ गये . लोग कहते हैं कि राहुल जब किसी पर भरोसा करते हैं तो पूरा करते हैं लेकिन जब उनको लगता कि उनके इसी भरोसे पर कोई फायदा उठा रहा है या उनके नाम का दुरुपयोग कर रहा है तो वो उसे छोड़ देते हैं . कब ये पता ही नहीं चल पाता.<br />
एक वाकया मेरे सामने हुआ 2019 के चुनाव के पहले महाराष्ट्र के बड़े नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल जो उस समय विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी थे वो सीट बंटवारे से पहले दिल्ली गये थे .उनको अशोक चव्हाण खुद लेकर राहुल गांधी के पास गये . उस समय विखे पाटिल अपने बेटे सुजय विखे पाटिल के लिए अहमदनगर की लोकसभा सीट चाह रहे थे जबकि एनसीपी नेता शरद पवार अपनी व्यक्तिगत खुन्नस के चलते ये सीट नहीं छोड़ रहे थे . विखे पाटिल परिवार ने शरद पवार को एक कानूनी मामले में फँसाया था और उसके चलते शऱद पवार का राजनीतिक कैरियर तक दांव पर लग गया था. विखे पाटिल राहुल के सामने पहुंचे तो राहुल ने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए कह दिय़ा कि शरद पवार की बात तो माननी ही होगी अगर आप अपने बेटे को लोकसभा टिकट दिलाना चाहते हैं तो एनसीपी से मैं बात कर सकता हूं . विखे पाटिल ने कहा कि उनके परिवार की राजनीति शरद पवार विरोधी है कैसे वो चले जाये तो राहुल ने कि फिर आप तय कर लें. विखे पाटिल भरे मन से बाहर आये अगले ही दिन बीजेपी चले गये .<br />
राहुल गांधी से उनके गोरखपुर दौरे में भी मैंने उनसे 2012 में यही सवाल पूछा था तो उन्होनें कहा था कि मुझे सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट ही नजर आता है ग्रे नहीं जबकि भारत की राजनीती में तो सब ग्रे हैं. यही राहुल की मुश्किल भी है . विदेशों में पढ़ाई और फाइनेंस सेक्टर में नौकरी का उन पर खूब असर हुआ वो सब कुछ साफ साफ देखना चाहते हैं और वो भरोसा जल्दी करते हैं और छोड़ते भी है.ये भारतीय राजनीति में बहुत कठिन हैं .यही सब उनके पिता राजीव गांधी के साथ भी होता था उनके कई मित्र साथ रहे और कठिन समय में छोड़ते चले गये . लेकिन सोनिया गांधी ने ये सीख लिया था इसलिए उन्होने ये गलती नही की . कांग्रेस में अपने कटटर विरोधी और साफगोई वाले लोगों को भी साधती रही , मनाती रही ,पद देती रही और यहां तक कि बिना मन के भी गुलाम नबी आजाद जैसों को बहुत ऊंचे पद तक ले गयी लेकिन राहुल नाराज हुये तो सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया .<br />
एक वाकया है कांग्रेस का दिल्ली के बुराड़ी में अधिवेशन चल रहा था तब अहमद पटेल जो तब सोनिया गांधी के सलाहकार थे वो मंच पर नहीं सामने आकर सोफे पर बैठ गये . तब राहुल की उनसे खटपट चल रही थी . सोनिया गांधी ने ये देखा तो राहुल को इशारा किया और राहुल से खुद जाने कहा .राहुल खुद जाकर हाथ पकड़कर अहमद पटेल को मंच पर लाये और पहली पंक्ति में बिठा दिया . ये तहजीब सोनिया गांधी को हमेशा सबसे ऊपर रखती रही . राहुल को अभी ये सब सीखने और खुद में बदलाव लाने की जरुरुत है लेकिन कहते हैं कि स्वभाव नहीं बदलता आदत बदल सकती है.<br />
अब भी कांग्रेस में राहुल के करीबी ही कई बार दखलंदाजी करते हैं . अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खऱगे को न चाहते हुए भी कई बार के सी वेणुगोपाल और राहुल के बाकी करीबियों की सुननी पड़ती है . खऱगे अब भी कई जगह मन से फैसले नहीं ले पाते और राहुल के करीबी गलत फैसले तक करा ले जाते हैं इसका असल महाराष्ट्र में तो खास तौर पर देखने मिलता है. जाहिर है लंबे समय तक पार्टी में ये सब अच्छा नहीं है. महाराष्ट्र में तो आने वाले समय में कम से कम 14 विधायक और कुछ बड़े नेता भी इसी लिए पलायन कर सकते क्योंकि राहुल उनकी सुनते नहीं और जिसकी सुनते हैं वो किसी और की नहीं सुनता .जाहिर है राहुल को तो पहले दोस्त सही चुनने होंगे और उन दोस्तों को पहले से ही सिर पर चढ़ाना बंद करना होगा और फिर अगर कुछ गलत भी हो तो बिना पता लगे साइडलाइन करना होगा ताकि पार्टी का नुकसान ना हो वरना ये दोस्तों के दोस्त ना रहने का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा .</p>
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		<title>अब चलेगी शिंदेशाही</title>
		<link>https://newsmantra.in/now-shindeshahi-will-run/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Jan 2024 08:42:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[Eknath Shinde]]></category>
		<category><![CDATA[shinde]]></category>
		<category><![CDATA[Shivsena]]></category>
		<category><![CDATA[udhav thackeray]]></category>
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					<description><![CDATA[-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर के करीब डेढ़ साल के इँतजार के बाद आये फैसले ने इतना तो साफ कर ही दिया है कि अब महाराष्ट्र में केवल शिंदेशाही चलेगी . सरकार में ही नहीं आने वाले चुनाव में भी .इस फैसले का महाराष्ट्र की राजनीति पर...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong><br />
महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर के करीब डेढ़ साल के इँतजार के बाद आये फैसले ने इतना तो साफ कर ही दिया है कि अब महाराष्ट्र में केवल शिंदेशाही चलेगी . सरकार में ही नहीं आने वाले चुनाव में भी .इस फैसले का महाराष्ट्र की राजनीति पर दूरगामी असर होगा. एक तरफ एकनाथ शिंदे अब सेफ हो गये है और अगले कुछ महीनों तक खुलकर खेल सकते हैं तो दूसरी तरफ उदधव ठाकरे गुट को कानूनी लड़ाई से आगे लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और सिम्पथी लेने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी क्योंकि अब अगला कोई भी बदलाव चुनाव के बाद ही होगा .<br />
लेकिन इन सबके बीच एक तीसरा खेमा भी है बीजेपी का जिसे अब चुनाव तक तो शिंदे की लीडरशिप में ही काम करना होगा . बीजेपी का चेहरा भी अब महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ही होंगे और देवेंद्र फणनवीस को फिलहाल साइड सीट से ही काम चलाना होगा . वो अभी तो ये नहीं कह पायेंगे कि मैं फिर आउंगा . इतना ही एकनाथ शिंदे की बारगेनिंग पावर भी इसके साथ ही बढ़ गयी है. वो भी अब लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उतनी सीट तो मांग ही सकते हैं जितने पर उनके विधायक और सांसद जीते यानि विधानसभा की 43 और लोकसभा की 13 सीटें . इससे बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना में भी संघर्ष बढ़ेगा .<br />
इसका एक फायदा अजीत पवार को भी होगा जो खुद ही अपने चाचा की पार्टी तोड़कर असली एनसीपी होने का दावा कर रहे हैं स्पीकर को उनके दावे पर भी फैसला देना है. चुनाव आयोग भी सुनवाई पूरी कर चुका है .अब अजीत पवार मान सकते हैं कि उनको भी असली एनसीपी के तौर पर चुनाव चिन्ह मिल जायेगा और उनके भी विधायक अयोग्य नहीं होंगे .इससे अजीत पवार की भी बारगेनिंग पावर बढ़ सकती है और अपना फैसला आने के बाद वो भी जीती हुयी सीटों के लिए दवाब बनायेंगे.<br />
इस बीच एक बात पर चर्चा शुरु हो गयी है कि अब बीजेपी चाहती है कि लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी हो जायें क्योकि विधानसभा में ये साबित हो गया है कि जो हुआ वो सही हुआ इसलिए बीजेपी मान रही है कि इससे उदधव ठाकरे गुट के प्रति बन रही सिम्पथी में कमी आयेगी जिसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है. इसी हफ्ते में बीजेपी ने दो अहम बैठकें पुणे और नाशिक में कोर ग्रुप की बैठक के तौर पर की जिसमें इस बात पर चर्चा की गयी कि चुनाव की तैयारी क्या हो. यानि भाजपा अंदरखाने से दोनों चुनाव के लिए तैयार हो रही है . उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि राष्ट्रपति कोविद की अध्यक्षता में बनी एक देश एक चुनाव की हाईलेवल कमिटी में सुझाव देने की अंतिम तारीख इसी महीने है और उसके बाद फरवरी तक रिपोर्ट आ गयी तो बजट सेशन में इसे मंजूर कर दिया जायेगा . तब बीजेपी चाहेगी कि कम से कम दस से ज्यादा राज्यों के चुनाव एक साथ तो हो जायें .इनमें महाराष्ट्र के साथ साथ झारखंड भी शामिल हो जायेगा.<br />
लेकिन इस घटनाक्रम ने कांग्रेस की चिंतायें भी बढ़ा दी है. कांग्रेस को अब इस बात का डर लगने लगा है कि उसके कम से कम 12 विधायक टूट सकते है और मार्च में होने वाले राज्यसभा चुनाव में खेल हो सकता है तब विधानसभा स्पीकर से उनको भी राहत मिल सकती है. अगर कांग्रेस के बड़े नेता टूटे तो इससे इंडिया गठबंधन के मनोबल पर असर होगा . दिल्ली में हुयी बैठक में भी इस बात पर चिंता जतायी गयी कि तीनों दलों के पास धनबल और बाहुबल की कमी है साथ ही सरकारी एजेंसियों के डर से कोई मदद भी नहीं कर रहा . तो चुनाव कैसे लड़ा जाये .कहा जा रहा है कि मराठवाड़ा के एक बड़े कांग्रेसी नेता अशोक चव्हाण अगर टूट गये तो कांग्रेस का मनोबल एकदम कम हो जायेगा.<br />
कुल मिलाकर हम कह सकते है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अगले कुछ महीने एकनाथ शिंदे के आसपास ही घूमेंगे.एक तरफ उन पर बीजेपी सहित गठबंधन को 48 में से 45 लोकसभा जीतने का भार होगा वहीं दूसरी तरफ अगर विधानसभा चुनाव हो गया तो कम से कम 50 सीटें लानी होगी ताकि अगली सरकार में भी उनकी सुनी जाये वरना बीजेपी अंदर खाने तो शतप्रतिशत भाजपा पर काम कर ही रही है .</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>राम और राम मंदिर से नहीं बीजेपी से लड़े विपक्ष</title>
		<link>https://newsmantra.in/opposition-should-fight-bjp-and-not-ram-and-ram-temple/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Jan 2024 06:18:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Mantra View]]></category>
		<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[AAYODHYA]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[Mantra]]></category>
		<category><![CDATA[ram]]></category>
		<category><![CDATA[RAM MANDIR]]></category>
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					<description><![CDATA[-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार महाराष्ट्र के युवा नेता और एनसीपी में कई बार विवादों में रह चुके जितेंद्र आव्हाड के नये बयान ने बीजेपी को एक नया मौका दे दिया है. आह्वाड ने बयान दे दिया कि राम तो वनवासी भी रहे हैं और सबके है साथ ही राम हम...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p>महाराष्ट्र के युवा नेता और एनसीपी में कई बार विवादों में रह चुके जितेंद्र आव्हाड के नये बयान ने बीजेपी को एक नया मौका दे दिया है. आह्वाड ने बयान दे दिया कि राम तो वनवासी भी रहे हैं और सबके है साथ ही राम हम सब की तरह ही मासांहारी भी थे . कोई इतने दिन जंगल में बिना वनवास नहीं रह सकता. बाद में विवाद बढा तो माफी मांग ली . लेकिन राजनीति अब थमने का नाम नहीं ले रही है .</p>
<p>असल में हो ये रहा है कि इन दिनों सारे खबरिया चैनल दिन रात राम और राममंदिर की कहानी और उससे जुड़े निर्माण कार्य की बातें कर रहे हैं. जाहिर है बीजेपी के लिए तो ये बेहतर है क्योंकि उनका एजेंडा ही यहीं है और वो इसे छुपा भी नहीं रहे . खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तरप्रदेश के योगी राममंदिर से जुड़े हर कार्यक्रम में जा रहे हैं. ऐसे में विपक्ष के कई नेता जो चाहते है कि मीडिया उनकी भी बात सुने इस खेल में फंस रहे है और वो बीजेपी से लड़ने के बजाय प्रभु श्री राम और राममंदिर के निर्माण पर तरह तरह की ऊटपटांग टिप्पणी कर रहे हैं . उत्तरप्रदेश में सपा का साथ दे रहे स्वामी प्रसाद मौर्य लगातार कई तरह के बयान दे चुके हैं तो दूसरी तरफ डीएमके और स्टालिन भी सनातन जैसी बातों पर अटैक कर रहे हैं. स्टालिन को तो खैर दक्षिण में इसका फायदा मिल भी सकता है क्योंकि राजनीति तो पेरियार की है लेकिन उत्तर के नेताओं के बयान खासा नुकसान कर रहे हैं.</p>
<p>बीजेपी की राजनीति भी यही है कि वो साबित कर सके कि उसके अलावा वो सारी पार्टियां जो बुलावे पर नहीं आ रही है या बयान दे रही वो सब राम और राममंदिर विरोधी है . ये हिंदुत्व और हिंदुत्व विरोधी विपक्ष का नरेटिव बीजेपी के लिए खासा फायदेमंद है .जाहिर है वो तो लगातार चाहते है कि कोई न कोई विरोध में बोलता रहे ताकि उस पर डिबेट हो सके . पहले मीडिया का काम अकेले असददुदीन ओवैसी से चल जाता था लेकिन ओवेसी की आवाज हाल के चुनाव में उतनी काम नहीं आ रही है इसलिए नये नायक ही नहीं नये खलनायक की भी मीडिया को उतनी ही तलाश है .</p>
<p>भारत की राजनीति में प्रयोग करने वाले चाहे महात्मा गांधी हो या समाजवादी विचारधारा के लोग उन्होने कभी भी राम और राममंदिर का विरोध नही किया . लेफ्ट प्रणित नेताओं ने जरुर धर्म की राजनीति का विरोध किया तो वो सिमट गया . कांग्रेस में भी कुछ नेता जो लेफ्ट की तर्ज पर बयान देते है वो केवल बयान वीर है उनकी राजनीति नहीं चली .जबकि कांग्रेस में तो नरसिंहराव से लेकर अर्जुनसिंह तक सब राम काजु कीजे बिना की बात करते रहे और साथ में सेक्युलर भी बने रहे . ये बात उत्तर की राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओ को समझ ही लेना चाहिये कि भारत में धर्म एक अभिन्न अंग जीवन का इसलिए चाहे राजनीति हो और कुछ कुछ इसे अलग करके नहीं देख सकते है .फिर प्रभु राम को रामचरित मानस ने घर घर पहुंचा ही दिया है . महात्मा गांधी भी तमाम सेक्युलर होने के बाद भी राम और वैष्णव की बात करना नहीं भूले . लेकिन उनको मानने वाले कई लोग भूलने लगे हैं.</p>
<p>असल में विपक्ष को बीजेपी से लड़ना है राम या राम मंदिर से नहीं जितना जल्दी ये बात विपक्ष मान लेगा उतना ही फायदा होगा .क्योंकि बीजेपी तो साफ कर ही चुकी है कि लोकसभा चुनाव तक उसका इस पर कैंपेन चलता रहेगा विपक्ष को बेहतर इस पर बोलने से बचना चाहिये हां अगर राम और राममंदिर के नाम पर हो रही राजनीति और बंटवारे की बात करे तो उसका फायदा होगा लेकिन प्रभु राम के बारे में जाने या अनजाने भी ऐसी कोई बात नहीं कही जाये जिससे लोक आस्था को चोट पहुंचे .</p>
<p>बाल्मिकी रामायण में कई ऐसे प्रसंग है जो आज के दौर के लिए गलत लग सकते हैं क्योंकि उसमें भगवान राम को एक सामान्य व्यक्ति की तरह दिखाया गया है लेकिन रामचरित मानस जो अवधी में होने के कारण घर घर पहुंची उसमें प्रभु राम की भक्ति है और उसी रुप में भारत के लोग राम को अवतारी पुरुष मानते हैं. इससे कोई खिलवाड़ नहीं हो सकता . बेहतर यही है कि विपक्ष या फेसबुकिया या वाटसपिया ग्यानी लोग प्रभु श्री राम के बारे में बेवजह कुतर्क अभी ना करें .अगर उनको बीजेपी से लड़ना है तो बाकी के राजनीतिक सवाल पर लड़े ..वैसे भी अब राममंदिर बन रहा है तो उस पर राजनीति ठीक नहीं ..<br />
बाकी कहते है कि होईये वही जो राम रचि राखा .</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>यूपी में कांग्रेस की जमीन है लेकिन बहुत मेहनत की जरुरत</title>
		<link>https://newsmantra.in/congress-has-land-in-up-but-a-lot-of-hard-work-is-needed/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Jan 2024 09:02:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[CONGRESS]]></category>
		<category><![CDATA[up]]></category>
		<category><![CDATA[UTTAR PRADESH]]></category>
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					<description><![CDATA[-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार इस साल देश के चुनाव है और देश का जब भी चुनाव होता है तो सत्ता का रास्ता उत्तरप्रदेश से ही निकलता है . उत्तरप्रदेश की 80 सीटें ही तय कर देती है कि देश की कमान कौन संभालेगा .भाजपा ने तो उत्तरप्रदेश में अयोध्या के...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong><br />
इस साल देश के चुनाव है और देश का जब भी चुनाव होता है तो सत्ता का रास्ता उत्तरप्रदेश से ही निकलता है . उत्तरप्रदेश की 80 सीटें ही तय कर देती है कि देश की कमान कौन संभालेगा .भाजपा ने तो उत्तरप्रदेश में अयोध्या के राममंदिर के सहारे ही अपना चुनाव प्रचार शुरु भी कर दिया और उधर कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश की तीन साल से महासचिव रहीं प्रियंका गांधी को हटाकर अनुभवी संगठनकर्ता अविनाश पांडे को महासचिव बनाकर कमान दी है . जाहिर है अब अविनाश पांडे को साबित करना होगा कि वो यूपी में कांग्रेस को फिर से कैसे जिंदा कर पाते हैं. अविनाश पांडे से खास बात की वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर ने</p>
<p><strong>सवाल ..</strong> उत्तरप्रदेश में कैसे बनायेंगे कांग्रेस को चुनौती बहुत बड़ी है .</p>
<p><strong>जवाब &#8230;</strong> उत्तरप्रदेश में कार्यकर्ता की कमी नहीं है माननीय प्रियंका गांधी ने भी संगठन को आगे ले जाने के लिए बहुत मेहनत की लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती बेहतर चुनावी परिणाम की है . हम इंडिया अलायंस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने जा रहे हैं .सीटों का फैसला पार्टी की समिती और आलाकमान मिल कर करेंगे .उत्तरप्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ता लगातार सड़क पर बने हुये हैं .नये अध्यक्ष अजय राय युवा और जूझारु है .. सबको साथ लेकर चलना है . हम लोगों तक ये बात पहुंचायेंगे कि मोदी सरकार देश का माहौल बिगाड़ रही है और मंहगाई तथा रोजगार जैसे सवालों पर लगातार बचकर चल रही है</p>
<p><strong>सवाल ..</strong> बीजेपी राममंदिर का मुददा उठा रही है कैसे इसका मुकाबला करेंगे ..</p>
<p><strong>जवाब ..</strong> देखिये राममंदिर के सबसे पहली शुरुआत तो राजीव गांधी जी ने की थी . हमारे लिए ये राजनीति का नहीं बल्कि आस्था का मुददा है. राम सबके है और प्रभु श्री राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं . भगवान राम का मंदिर बने ये सब चाहते हैं लेकिन इसके लिए किसी और समुदाय या लोगों को डराना और आतंकित करना ठीक नहीं है .सबको साथ लेकर ये काम होना चाहिये . हमें भी जब संभव होगा दर्शन करने जायेंगे . इस पर बीजेपी राजनीति करना चाहती है और इसे राजनीति का मुददा बना रही है जबकि ये तो लोगों की आस्था का सवाल है .</p>
<p><strong>सवाल..</strong> गठबंधन में बहुत सी मुश्किलें सामने आ रही है कैसे गठबंधन होगा कितनी सीट पर लड़ेंगे ..</p>
<p><strong>जवाब ..</strong> देखिये हम इंडिया अलायंस के साथ चुनाव लड़ेगे इसमें कोई भी संकोच नहीं है.कौन कितनी सीट पर लड़ेगा ये आलाकमान तय करेगा हमारी प्राथमिकता ऐसे उम्मीदवार का चयुन करना होगा जो फासिस्टवादी भाजपा को हरा सके . अगर हमने उत्तरप्रदेश में भाजपा का रथ रोक दिया तो फिर केंद्र में मोदी सरकार की वापसी मुश्किल होगी . लोगों को ये बताना होगा कि हम देश और संविधान को बचाना चाहते हैं. सीटों के बारे में मिलकर तय करेंगे अभी से यह कहना ठीक नहीं कि कौन कितनी सीटें पर लड़ेगा .</p>
<p><strong>सवाल ..</strong> मोदी के सामने चेहरा कौन होगा क्या राहुल गांधी चेहरा होंगे ..</p>
<p><strong>जवाब ..</strong>माननीय श्री राहुल गांधी लगातार देश के सवालों को उठा रहे हैं और उनकी कही हुयी हर बात सही साबित हो रही है. राहुल जी देश के गरीब . दलित अल्पसंख्यक सबकी बात कर रहे हैं राहुल जी ने ही ओबीसी की जातिगत जनगणना की बात कही है . देश में हम न्याय स्कीम चाहते हैं जिसमें सबको बराबर से तरक्की का मौका मिले ..जब तक देश के हर व्यक्ति को अवसर नहीं मिलेगा तब तक कैसा विकास और किसका विकास . मोदी सरकार तो बस अपने कुछ उघोगपति मित्रों का ही विकास कर रही है और बाकी देश की जनता मंहगाई और बेरोजगारी से परेशान है ..माननीय राहुल गांधी विचार धारा की लड़ाई लड़ रहे है और असली सवाल उठा रहें है तभी तो मोदी सरकार ने उनकी संसद सदस्यता तक छीनने की कोशिश की .हम सत्ता के लिए नहीं देश के लिए काम करना चाहते हैं.</p>
<p><strong>सवाल ..</strong>यूपी में ब्राह्मण और सवर्ण समाज बीस फीसदी से ज्यादा है . क्या आप उनको कांग्रेस के साथ जोड़ पायेंगे ..</p>
<p><strong>जवाब..</strong> ये सच है कि मैं ब्राह्मण समाज से हूं और इसका मुझे गर्व भी है लेकिन हमने कभी इस तरह की जातिगत राजनीति नहीं की .. यूपी में हम ब्राह्मण और सवर्ण ही नहीं दलित अल्पसंख्यक और सभी समाज को साथ लेकर चलना चाहते हैं. ब्राह्मण समाज के अपने सवाल है उनको भी रोजगार और मंहगाई की उतनी ही तकलीफ है जितनी बाकी सबको .. हम सबकी बात सुनेंगे और सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश करेंगे .</p>
<p>हमारा मत</p>
<p>उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जिस डरावने गर्त में पड़ी हुई है, वहां से उसका फिर से ऊपर उठना आसान नहीं है। ऐसे दुर्गम हालात में नए प्रभारी अविनाश पांडे से बहुत उम्मीद करना राजनीतिक बेवकूफी ही साबित होगी। हालांकि अविनाश पांडे को बेहद बिगड़े राजनीतिक हालात सम्हालने और सुधारने में महारत हासिल है। अपनी इस सामर्थ्य क्षमता का प्रदर्शन वे राजस्थान में कांग्रेस की सरकार उलटने निकले सचिन पायलट की बगावत को सम्हालकर बखूबी कर चुके हैं। झारखंड में भी प्रभारी के तौर पर हालात को सहेजने में वे सफल साबित रहे हैं। लेकिन जिस पार्टी ने 1947 से 1989 के बीच लगभग चार दशक तक उत्तर प्रदेश पर राज किया वो कांग्रेस अब लोकसभा की केवल एक सीट पर सिमट गई है और 403 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में केवल दो सीटों तक सिमट कर रह गई कांग्रेस पार्टी को राज्य में यहां से आगे ले जाना पांडे के लिए बड़ी जिम्मेदारी मानी जा रही है।</p>
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		<title>नये साल में सरकार से उम्मीद भी और चुनौतियां भी</title>
		<link>https://newsmantra.in/expectations-and-challenges-from-the-government-in-the-new-year/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Jan 2024 08:57:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[2023]]></category>
		<category><![CDATA[2024]]></category>
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		<category><![CDATA[CONGRESS]]></category>
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					<description><![CDATA[-संदीप सोनवलकर, वरिष्ठ पत्रकार साल 2024 वैसे तो ये भी एक और साल है लेकिन भारत के लिहाज से देखें तो एक बहुत ही महत्वपूर्ण साल है क्योंकि इसी साल की दूसरी तिमाही में लोकसभा के चुनाव होंगे और उसी में नयी सरकार बनेगी जो अगले पांच साल के लिए...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>-संदीप सोनवलकर, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p>साल 2024 वैसे तो ये भी एक और साल है लेकिन भारत के लिहाज से देखें तो एक बहुत ही महत्वपूर्ण साल है क्योंकि इसी साल की दूसरी तिमाही में लोकसभा के चुनाव होंगे और उसी में नयी सरकार बनेगी जो अगले पांच साल के लिए देश की दशा और दिशा दोनों तय करेगी . बीजेपी ने अभी से मोदी 3.0 यानि तीसरी बार भी मोदी सरकार की तैयारी शुरु कर दी है वहीं विपक्ष भी मोदी सरकार को चुनौती देने के लिए इंडिया एलायंस को ठीक करने में लगा है . चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी मैं नहीं करूंगा लेकिन इस साल की उम्मीद और चुनौतियों पर तो बात हम कर ही सकते हैं.</p>
<p>इकानामी की रफ्तार .. कोविड के तीन साल और उसके बाद जीएसटी नोटबंदी के असर के बाद इस साल बाजार में फिर से तेजी आने की उम्मीद है . मोदी सरकार की वापसी के साथ बाजार को स्थिरता की उम्मीद है . भारत इस बार कम से कम सात प्रतिशत की ग्रोथ रेट की उम्मीद कर रहा है और सरकार भी पांच ट्रिलियन इकानामी की तरफ कदम बढाना चाहती है . लेकिन इसी इकानामी में पूरी दुनिया में सुस्ती और युदध के असर के संकेत भी दिख रहे हैं ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इकानामी की रफ्तार बनाये रखना और साथ ही पूंजी के नये रास्ते खोलने की जरुरत है . बीते दो साल में स्टार्टटप की इकानामी ठप पड़ गयी है और ये कहा जा रहा है कि केवल बड़े उघोग ही पैसा कमा रहे हैं लेकिन अब इसे आगे ले जाने की जरुरत है तभी देश में पूंजी का सृजन और विस्तार होगा . हालांकि फरवरी में सरकार का अंतरिम बजट होगा लेकिन उसके बाद जुलाई में पूरे बजट के साथ सरकार को बताना होगा कि उसकी इकानामी को लेकर क्या सोच है. हो सकता है कि तब तक देश को कोई नया वित्त मंत्री भी मिल जाये .</p>
<p>रोजगार की चुनौती . भारत में इस समय बेरोजगारी की दर सात से आठ प्रतिशत और कुछ राज्यों में तो बीस प्रतिशत तक दिख रही है .. ये साल रोजगार के हिसाब से बहुत अहम होगा एक तरफ जहां चुनावी वादे करने होगे वहीं दूसरी तरफ रोजगार देने के नये अवसर तलाशने होगे . सरकार ने विश्वकर्मा कौशल योजना चालू की है और लोकल से वोकल जैसे नारे भी दिये है लेकिन असल मे अभी भी छोटे उघोंगों में सुस्ती बरकरार है और नये प्रोडक्ट की गुंजाइश कम दिख रही है ऐसे में उनकी खरीद और एक्सपोर्ट दोनों पर ही ध्यान देना होगा .इसके साथ ही इंफ्रा सेक्टर में भी बड़े निवेश और सुधार की तरफ देखा जा रहा है तभी इकानामी का पहिया घूमेगा . सरकारी नौकरी की गुंजाइश कम दिख रही है और अगर कहीं होगी भी तो वो अग्निवीर की तर्ज पर ही होगी ऐसे में बड़ी संख्या में रोजगार सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है. आभासी समझ यानि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस साल बहुत बड़ा इस्तेमाल होगा इसका असर रोजगार देने वाली आईटी इंडस्ट्री पर अभी से दिखने लगा है . सरकार को रोजगार के लिए बड़े फैसले और निवेश दोनों पर काम करना होगा.</p>
<p>सांप्रदायिक सौहार्द &#8230; देश में इस समय चुनावी माहौल के कारण कड़वाहट बढती जा रही है. एक तरफ जहां राममंदिर के बनने का माहौल है तो दूसरी तरफ अल्पसंखयक समुदाय में लगातार डर की भावना आ रही है ..विदेशों में भी आतंक के बढ़ने की कई घटनाये हुयी है. इसलिए ये साल आतंकी हमलों का डर बना रहेगा वहीं देश में आपसी मेल जोल और सौहार्द बनाये रखने की जरुरत है . वाटसअप यूनिवर्सिटी के ग्यान के बजाय सच में लोगों के बीच सही जानकारी और आपसी तालमेल एक बड़ी चुनौती होगी क्योकि किसी भी देश में अगर अँदरूनी तनाव का माहौल रहेगा तो तरक्की में रुकावट आ सकती है.</p>
<p>मंहगाई .. देश में बढती मंहगाई और खेती में बढता खर्च दोनों ही एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं .सरकारें चुनावी घोषणा तो कर दे रही है लेकिन आम आदमी को मंहगाई से राहत मिलने की कोई उम्मीद अभी नजर नहीं आती ..तेल की किल्लत और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमत बढ़ने के चलते मंहगाई और बढ सकती है. ऐसे में सरकार को इसमें दखल देना होगा .सब्सिडी की इकानामी बहुत देर तक नहीं चल सकती. हमारे पड़ोसी देशों श्रीलंका और पाकिस्तान का हाल हम देख चुके हैं ऐसे में भारत को बहुत संभलकर चलने की जरुरत है . मंहगाई रोकने के लिए उत्पादन में बढत और विदेशों से आयात के लिए समझौते बहुत काम कर सकते हैं लेकिन दुनिया भर मे इस समय आबदी और मांग दोनों बढ रहे है तो उसके लिए उत्पादन बढ़ाना भी जरुरी है .</p>
<p>कुल मिलाकर हम देखें तो ये साल भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और घटनाओं से भरा होगा . उम्मीद हम इतनी ही कर सकते है कि इक बरामन ने कहा है कि साल अच्छा है .</p>
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		<title>सेमीफाइनल का होगा असर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से बदलेगी तस्वीर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[News Mantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Nov 2023 06:29:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[CONGRESS]]></category>
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		<category><![CDATA[Moi]]></category>
		<category><![CDATA[Narendra Modi]]></category>
		<category><![CDATA[PM MODI]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[RAHUL GANDHI]]></category>
		<category><![CDATA[semi finals]]></category>
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					<description><![CDATA[लोग भले माने या माने या इसे खारिज करने की कोशिश करें लेकिन ये तय है कि तीन दिसंबर को पांच राज्यों के चुनावी परिणामों का दूरगामी असर होगा . सबसे बड़ा असर मनोबल पर होगा जीत हार से ज्यादा . कांग्रेस अगर तीन राज्य मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ और तेलंगाना...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>लोग भले माने या माने या इसे खारिज करने की कोशिश करें लेकिन ये तय है कि तीन दिसंबर को पांच राज्यों के चुनावी परिणामों का दूरगामी असर होगा . सबसे बड़ा असर मनोबल पर होगा जीत हार से ज्यादा . कांग्रेस अगर तीन राज्य मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ और तेलंगाना जीत गयी तो वो देश में विरोधी मोर्चे इंडिया गठबंधन को लीड करने की दावेदार होगी वहीं बीजेपी जीती तो पार्टी में आयी सुस्ती हटेगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा में फिर से बड़ी जीत का रास्ता तय होगा.</p>
<p>सबसे मजेदार चुनाव तेलंगाना को होगा क्योंकि कांग्रेस अगर जीत जाती है तो कर्नाटक के बाद दक्षिण का सबसे बड़ा उलटफेर होगा . इसके दो संदेश होंगे एक तो कांग्रेस की दक्षिण में दमदार वापसी का रास्ता खुलेगा दूसरा बीजेपी के दक्षिण का दरवाजा बंद हो सकता है. इसलिए पूरे चुनाव में बीजेपी का जोर इस बात पर रहा कि भले उसे सीट कम मिले लेकिन बीआरएस जीतना चाहिये कांग्रेस नहीं . राहुल गांधी ने इसका खुलासा भी किया कि बीजेपी के दो यार ओवेसी और केसीआर लेकिन चुनाव परिणाम के बाद सब भूल जायेगें .</p>
<p>उधर मध्यप्रदेश का चुनाव भी कम दिलचस्प नहीं है . अनुमान बता रहा है कि जीत का अंतर कांग्रेस और बीजेपी में दस से बारह सीटों का ही होगा यानि 2018 की तरह ही मामला फंस सकता है . पिछली बार 35 सीटें ऐसी थी जिन पर अंतर पांच हजार से कम वोटों का था इन्ही पर जोर दोनों ने लगाया है. इसके अलावा बीजेपी ने सांसदों और मंत्रियों को चुनाव में उतारकर चुनाव को उठा दिया है. कहा जा रहा है कि गुजरात की तरह ही बीजेपी एमपी को अपनी प्रयोगशाला मानती है और चुनाव जीतने के लिए सब कुछ किया गया है. कांग्रेस में तकलीफ ये कि कर्नाटक जीतने के बाद वो ओवर कांफिंडेस मे है इसलिए चुनाव पूरी तरह के कमलनाथ पर छोड़ दिया गया है और वो ही जीत हार के जिम्मेदार होंगे . ऐसे में खेल उलट भी सकता है.</p>
<p>छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल में मोर्चा संभालकर रखा है और वो जीत के करीब भी है लेकिन बीजेपी ने नक्सल बहुल इलाकों में पहले राउंड में बहुत मेहनत की और वहां बीजेपी को बीस में से 7 या आठ सीट मिल सकती है जबकि पिछली बार यहां 20 में 19 सीट कांग्रेस ले गयी थी ये अंतर भी जीत के मार्जिन को कम कर सकता है. दूसरी तरफ राजस्थान में भले ही अशोक गहलोत ने चुनाव ठीक से लड़ा है लेकिन ये इबारत साफ है कि कांग्रेस किसी भी हालत में 70 सीट से आगे नहीं जा रही है . गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई में हार कांग्रेस की ही होगी .</p>
<p>इन चुनाव परिणामो का असर राष्ट्रीय राजनीती पर जरुर होगा . इंडिया गठबंधन में कांग्रेस अभी किसी से बात नहीं कर रही है .अगर कांग्रेस तीन राज्य जीत गयी तो वो बारगेन करने की हालत में होगी अगर हारी तो झुककर काम करना होगा तब रीजनल पार्टियां हावी हो जायेगी साथ ही कांग्रेस के बहुत से नेता देशभर में इंतजार कर रहे हैं कांग्रेस हारी तो अगला प्रयोग महाराष्ट्र और कर्नाटक में जल्द हो सकता है. कांग्रेस अगर जीत गयी तो फिर देश की हवा पलटेगी और बीजेपी को अगला लोकसभा चुनाव कठिन होगा .यानि सेमीफाइनल जीत हार से ज्यादा मनोबल पर असर डालेगा .</p>
<p><strong>-संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
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