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		<title>मराठा वोट बैंक अब बंट गया कई खानों में फायदा बीजेपी को मिलेगा</title>
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		<pubDate>Tue, 05 Mar 2024 08:15:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महाराष्ट्र बनने के बाद से ही राज्य की राजनीति को कंट्रोल करने वाले मराठा वोट बैंक में सेंध लग गयी है और अब मराठा वोटर इतना भ्रम में है कि उसे समझ नहीं आ रहा है कि नेताओं के साथ जाये या अलग से अपना भला सोचे . इसका सीधा...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>महाराष्ट्र बनने के बाद से ही राज्य की राजनीति को कंट्रोल करने वाले मराठा वोट बैंक में सेंध लग गयी है और अब मराठा वोटर इतना भ्रम में है कि उसे समझ नहीं आ रहा है कि नेताओं के साथ जाये या अलग से अपना भला सोचे . इसका सीधा फायदा बीजेपी को लोकसभा चुनाव में मिलेगा क्योंकि अब तक मराठा वोट परंपरागत तौर पर कांग्रेस या शरद पवार की एनसीपी के साथ ही रहा है लेकिन अब करीब 28 फीसदी ये वोट कई खानों में बंट गया है.</p>
<p>असल में बीजेपी का हमेशा से ये प्रयोग रहा है कि महाराष्ट्र में मराठों के मजबूत वर्चस्व को तोड़ने के लिए माधव फार्मूला यानि माली धनगर और वंजारी सारे ओबीसी को एक साथ लाया जाये और मराठा बनाम ओबीसी को तेज किया जाये जिससे मराठा अगर एक तरफ जायें तो पूरा ओबीसी बीजेपी के साथ आ जाये .इसका फायदा बीजेपी को 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला भी लेकिन अब बीजेपी उससे एक कदम आगे बढ़ गयी है. राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि संघ की सलाह पर बीजेपी ने मराठा वोट बैंक को ही अब कई खानों में बांट दिया है. एकनाथ शिंदे के तौर पर मराठा सीएम बनाकर पहले तो शिवसेना का वोट बैंक तोड़ा फिर कुछ दिन बाद अजित पवार को लेकर शरद पवार के मराठा वोट बैंक में सेंध लगा दी.</p>
<p>इतना ही नहीं दूसरी तरफ जब मराठों ने अपने राजनीतिक वजूद की ताकत दिखाने के लिए मराठा आऱक्षण का आंदोलन शुरु किया तो पहले तो मराठों को कुनबी यानि ओबीसी और गैर कुनबी में बांट दिया . इस आंदोलन को लेकर मनोज जरांगे नाम का एक मराठा युवक बहुत लोकप्रिय हुआ उसके पीछे पूरा समाज खड़ा दिखाई दिया लेकिन सरकार ने उसकी कुछ मांगे मानी कुछ नहीं और आखिर में मराठा आरक्षण का केवल प्रस्ताव विधानसभा में पास कर दिया तो अगले ही दिन मनोज जरांगे को भी शब्दजाल में फंसा कर डिसक्रेडिट कर दिया . मजबूरन मनोज जरांगे को अपना आंदोलन बीच में ही छोड़ना पड़ा . इससे पूरा मराठा समाज निऱाश है .<br />
दूसरी तरफ छगन भुजबल की लीडरशिप में ओबीसी ने बिना कुछ हिंसा के अपना अधिकार बचाये ऱखने के लिए जमकर दवाब बनाया और सरकार को मजबूर किया कि वो मराठों को ओबीसी में शामिल करने के बजाय अलग से आरक्षण दे जबकि पचास प्रतिशत की सीमा के चलते जातिगत आधार पर अलग से ये आरक्षण देना कानूनी तौर पर नहीं टिकेगा . अब ओबीसी को संदेश साफ है कि इतना बड़ा आंदोलन करके भी मराठा समाज को कुछ नहीं मिला.</p>
<p>इस सबसे मराठा नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है इसलिए वो मजबूरी में ही सही लेकिन किसी भी हालत में बीजेपी के साथ जाने तैयार नही है. उनका वोटर इसके लिए तैयार नहीं लेकिन नेताओं को खुद को बचाना है इसलिए वो बीजेपी के साथ जाकर मोदी लहर में ही जीतना चाहते हैं. कांग्रेस के अशोक चव्हाण जैसे दिग्गज नेता भी इस मोह से नहीं बच पाये और बीजेपी चले गये . और भी करीब 15 मराठा नेता एक एक करके बीजेपी का दामन थाम रहे हैं. उधर शरद पवार की ये आखिरी पारी है सो वो कितना मराठा वोट ले पायेंगे ये तो चुनाव में ही पता चल पायेगा लेकिन उनके ही परिवार में फूट पड़ गयी है . बेटी के खिलाफ ही पवार परिवार की बहू लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती है.</p>
<p>महाराष्ट्र के इतिहास पर नजर डालें तो मुगल काल और आदिलशाही में यही हुआ था मराठा अपने घर और वतनदारी को बचाने के लिए अलग अलग खेमें में बंटे हुए थे और बाहरी राज कर रहे थे तब सोलहवी सदी के अंत में मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठों के मतभेद खत्म कर एक साथ किया और स्वराज्य की बात की लेकिन अब इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है. मराठा अब तक सत्ता पर हावी रहे हैं .एक या दो बार को छोड़कर मराठा ही मुखयमंत्री बनता है और राज्य की सहकारी चीनी मिलों से लेकर शिक्षण संस्थानों तक पर उनका ही राज रहा है लेकिन अब ये पकड़ छूट रही है . अगर मराठों की राजनीतिक ताकत कम हुयी तो इसका खामियाजा पूरे समाज पर होगा .</p>
<p><strong>-संदीप सोनवलकर </strong></p>
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		<title>मराठा हो रहे एकजुट चाहे किसी दल में हो</title>
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		<pubDate>Wed, 06 Nov 2019 07:09:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[News Mantra: Exclusive]]></category>
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					<description><![CDATA[महाराष्ट्र में राजनीतीक उठापटक के पीछे की एक बडी वजह राज्य मे हो रहा मराठा एकीकरण है. बीते पांच साल से हाशिये पर चल रहे मराठा नेता चाहे वो किसी पार्टी के हो फिर से मराठा मुख्यमंत्री बनाने की जुगत में लगे हैं. मराठा नेताओं को लगता है कि चाहे...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>महाराष्ट्र में राजनीतीक उठापटक के पीछे की एक बडी वजह राज्य मे हो रहा मराठा एकीकरण है. बीते पांच साल से हाशिये पर चल रहे मराठा नेता चाहे वो किसी पार्टी के हो फिर से मराठा मुख्यमंत्री बनाने की जुगत में लगे हैं. मराठा नेताओं को लगता है कि चाहे किसी दल का भी मराठा मुख्यमंत्री बने मराठा प्राईड फिर से आ जायेगी .</p>
<p>राज्य में बीते पांच साल से देवेन्द्र फणनवीस सरकार के कारण मराठा हाशिये पर है . केवल मंत्रिमंडल ही नहीं बल्कि सत्ता चलाने वाले ब्यूरोक्रेसी में भी ब्राहमण अफसरो की ही चल रही है . इसलिए चुनाव में ओबीसी और मराठा दोनों वोट बैंक ने बीजेपी का साथ छोडा और अपने अपने जातिगत अभिमान के लिए वोट किया .ये बात मुंबई और दिल्ली के राजनीतिक रणनीतिकारों को भी समझा दी गयी .</p>
<p>कांग्रेस के दिल्ली के नेता भले ही कुछ भी समझे लेकिन महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता अशोक चव्हाण . पृथ्वीराज चवहाण जैसे दिगगज तक किसी हाल मे मराठा सीएम बनाने की तैयारी में लगे है . यही बात वो कांग्रेस आलाकमान को नये तरीके से समझा रहे है कि बीजेपी को दूर करने के लिए एनसीपी शिवसेना को समर्थन दे दिया जाये .शिवसेना की तरफ से भी मराठा नेता एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता चुन लिया गया है ताकि मौका लगे तो मराठा एकजुटता के लिए काम आये .शिवसेना प्रमुख उदधव और उनके बेटे आदित्य सीएम नहीं बनेगे तो शिंदे को आगे किया जायेगा.</p>
<p>एनसीपी छत्रप शरद पवार लंबे समय बाद महाराष्ट्र में मराठा कार्ड खेल रहे हैं. एनसीपी में 56 में से 24 विधायक मराठा है जबकि कांग्रेस में 17 विधायक मराठा चुनकर आये हैं . शिवसेना में भी 19 विधायक मराठा चुनकर आये हैं. जाहिर है सब किसी भी मराठा के नाम पर एकजुट हो सकते हैं.</p>
<p>महाराष्ट्र में मराठों की संख्या करीब 26 फीसदी मानी जाती है और राज्य बनने के बाद से कुछ मौके छोडकर हर बार मराठा ही मुख्यमंत्री रहा है लेकिन देवेन्द्र फणनवीस ने सरकार बनाने के बाद चुन चुनकर अपने और दूसरे दलों के मराठों को दरकिनार किया. ये बात बीजेपी मे भी महसूस की जा रही है . बीजेपी में भी मराठा नेता चंद्रकांत पाटिल के पीछे पार्टी के मराठा नेता एकजुट हो रहे है . पाटिल चुप है और नाम अभी देवेन्द्र फणनवीस का ले रहे हैं.</p>
<p>राज्य में भले ही ना दिखती हो लेकिन अंदरखाने नौकरशाही में और राज्यसत्ता मे जातिगत समीकरण खूब चलता है. फणनवीस के सीएम बनने के बाद मराठा और ओबीसी दोनों नाराज है यही वजह कि राज्य में वोटिंग के दौरान मराठों ने एनसीपी और कांग्रेस को तो ओबीसी ने शिवसेना और प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाडी को जमकर वोट दिया .</p>
<p>बीजेपी के वार रुम में बूथ वाईस वोटिंग का पूरा आंकलन लगातार जारी है. जिसमें खुलकर सामने आया है कि मराठा वोटबैक ने रणनीतिक तौर पर वोटिंग की . यहां तक कि मराठा वोट बैंक ने सातारा में उदयन राजे को हराकर मराठा श्रीनिवास पाटिल को हराकर मैसेज दिया कि मराठा बीजेपी से नाराज हैं. यही संदेश ओबीसी ने पंकजा मुंडे को बीड में हराकर दिया. राज्य में देवेन्द्र फणनवीस ने मराठा आरक्षण भी दिया लेकिन फिर भी नहीं माने . अब भाजपा को ये बातें समझ आ गयी है. हरियाणा में भी जाट वोट बैंक ने चौटाला और हुडडा को जिताकर संदेश साफ दिया है .</p>
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