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	<title>KAPIL SIBBAL &#8211; newsmantra.in l Latest news on Politics, World, Bollywood, Sports, Delhi, Jammu &amp; Kashmir, Trending news | News Mantra</title>
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		<title>कांग्रेस लीडरशिप को ये आवाज सुनना चाहिये</title>
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		<pubDate>Mon, 23 Nov 2020 05:25:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Mantra View]]></category>
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					<description><![CDATA[कांग्रेस में इन दिनों कई बडे नेता अपनी राजीनीति को जोखिम में डालकर भी आवाज उठा रहे है .वो ये जानते है कि उनके बोलने पर चापलूस नेताओं की जमात उनको दरकिनार कर सकती है लेकिन जरुरी है कि कांग्रेस लीडरशिप इन आवाजों को सुनें ताकि बदलाव की जमीन तैयार हो सके.]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कांग्रेस में इन दिनों कई बडे नेता अपनी राजीनीति को जोखिम में डालकर भी आवाज उठा रहे है .वो ये जानते है कि उनके बोलने पर चापलूस नेताओं की जमात उनको दरकिनार कर सकती है लेकिन जरुरी है कि कांग्रेस लीडरशिप इन आवाजों को सुनें ताकि बदलाव की जमीन तैयार हो सके.</p>
<p>कपिल सिब्बल के बाद अब सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हमारे लोगों का ब्लॉक स्तर पर, जिला स्तर पर लोगों के साथ कनेक्शन टूट गया है। जब कोई पदाधिकारी हमारी पार्टी में बनता है तो वो लेटर पैड छाप देता है, विजिटिंग कार्ड बना देता है, वो समझता है बस मेरा काम खत्म हो गया, काम तो उस समय से शुरू होना चाहिए। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि चुनाव 5-सितारा होटल में बैठकर नहीं जीते जाते। आज नेताओं के साथ समस्या यह है कि अगर उन्हें पार्टी का टिकट मिलता है, तो वे पहले 5-सितारा होटल बुक करते हैं। अगर कहीं कोई उबड़-खाबड़ सड़क है तो वे वहां नहीं जाएंगे। जब तक ये कल्चर हम नहीं बदलेंगे, हम चुनाव नहीं जीत सकते।</p>
<p><strong><br />
</strong>गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हम सभी नुकसान के बारे में चिंतित हैं, खासकर बिहार और उपचुनाव परिणामों के बारे में। मैं नुकसान के लिए नेतृत्व को दोष नहीं देता हूं। क्योंकि पार्टी के बड़े नेताओं का जमीनी स्तर पर संपर्क टूट गया है। ब्लॉग लेवल पर, जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं का संबंध लोगों से टूट गया है। आदमी को पार्टी से इश्क होना चाहिए। गुलाम नबी आजाद ने शेर सुनाते हुए कहा कि ये इश्क़ नहीं आसां इतना ही समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।</p>
<p><strong><br />
</strong>आजाद ने कहा, &#8216;हमारा ढांचा कमजोर है, हमें ढांचा पहले खड़ा करना पड़ेगा। फिर उसमें कोई भी नेता हो चलेगा। सिर्फ नेता बदलने से आप कहेंगे कि पार्टी बदल जाएगी, बिहार आएगा, मध्य प्रदेश आएगा, उत्तर प्रदेश आएगा, नहीं वो सिस्टम से बदलेगा।&#8217;</p>
<p>हालांकि आजाद के बयान के बाद विरोध भी शुरु हो गया है .पश्चिम बंगाल से सांसद अधीर रंजन चौधरी ने तो असंतुष्ट नेताओं को पार्टी छोडने की सलाह दे दी है . लेकिन ये रास्ता नहीं है असल में दोनों तरफ के विचारों को सुनकर ही रास्ता निकलना चाहिये .</p>
<p>इस बयान के बारे में पूछे जाने पर  सलमान खुर्शीद ने कहा कि शार्टकट से उनका मतलब अपनी विचारधारा त्यागने से था. उन्होंने कहा, ‘‘आपको अपनी विचारधारा क्यों छोड़नी चाहिए. यदि आपकी विचारधारा मतदाताओं को आपके लिए मतदान करने के लिए राजी नहीं कर पा रही है, तो या तो आपको अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए या आपको इंतजार करना चाहिए. हम मतदाताओं को राजी कर रहे हैं, इसमें समय लगेगा.’’</p>
<p>इस बीच वित्तमंत्री रहे पी चिंदबरम ने भी पार्टी में बदलाव का सुझाव दिया है .कांग्रेस गिरती अर्थव्यवस्था और कोरोनावायरस संकट के मुद्दे होने के बावजूद अच्छी मौजूदगी नहीं जता पाई, इस पर चिदंबरम ने कहा कि &#8216;मुझे गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के उपचुनावों की चिंता ज्यादा है. यह नतीजे दिखाते हैं कि या तो पार्टी की जमीन पर संगठन के तौर पर मौजूदगी ही नहीं है, या फिर बहुत ज्यादा कम हुई है</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>कांग्रेस में  सुधारों को अब टाला नहीं जा सकता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Newsmantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 Nov 2020 05:11:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[bihar election]]></category>
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					<description><![CDATA[कांग्रेस में बडे सुधारों को अब टाला नहीं जा सकता]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p>संदीप सोनवलकर</p>
<p>बिहार चुनाव के बाद लगातार कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठ रहे है . सब ये कह रहे है कि खतरा ये है कि चुनावी हार के साथ साथ कांग्रेस की साख भी नहीं चली जाये. जाहिर है कांग्रेस ने अब भी कदम नहीं उठाये तो उसकी हालत अजीत सिंह की लोकदल की तरह हो जायेगी जहां नाम तो बडे होगें लेकिन दर्शन छोटे .</p>
<p>कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने सही सवाल उठाया है कि क्या कांग्रेस ने हार को नियती मान लिया है . उनका कहना है कि कांग्रेस ये सोचकर नहीं बैठ सकती कि जब बीजेपी हारेगी तभी कांग्रेस जीत पायेगी तब तक कुछ करने की जरुरत नहीं है . कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने भी सही सवाल उठाया है कि सोचना पडेगा कि गलती कहां हो रही है. जाहिर है तुंरत सीडब्लयूसी की बैठक बुलाकर विचार मंथन करने की जरुरत है. ये नहीं कि बहुत वक्त बीत जाये तब बैठक बुलाये . राहुल को भी सवालों का सामना तो करना है पडेगा. सबसे पहले तो राहुल को बदलना होगा कि चुनाव कोई भी हो वो केवल लोकल लीडर्स के भरोसे नहीं लडा जा सकता है. बिहार का ही उदाहरण ले तो राहुल केवल तीन दिन गये और बाकी दिन शिमला  में पिकनिक मनाते रहे .राहुल को सीजनल पालिटिशियन से सीजन्ड पालिटिशियन बनना होगा .बेहतर होता राहुल शिमला में बैठकर भी रोज शाम को सारे नेताओं से अलग अलग फीडबैक लेते रहते .अगर वो 70 सीटों के कार्यकर्ताओं से एक एक बार भी वर्चुअल ही सही मिल लेते तो कार्यकर्ता उत्साह में रहे. मोदी और अमित शाह तक पूरे चुनाव में बिहार में दिखते रहे .</p>
<p>गठबंधन पहले से हो</p>
<p>जिन राज्यो में कांग्रेस को पहले से पता है वहां तो कम से कम गठबंधन और सीटों का बंटवारा तय समय पर कर ले ताकि कार्यकर्ता को समय मिले . बिहार में नामांकन से दो दिन पहले सीट फाइनल की वो भी 70 सीट जिसमें केवल 19 जीत पाये . जबकि आरजेडी से समझौता करना है ये तो राहुल खुद तेजस्वी से मिलकर तय कर लेते उसके लिए बाकी नेताओं पर छोडने की जरुरत नहीं थी. राहुल को युवराज की मानसिकता से बाहर आना होगा .</p>
<p>उम्मीदवार चयन में ईमानदारी .</p>
<p>कांग्रेस उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया तो दिखावे के लिए पूरा करती है लेकिन असल में अंदरखाने सारे बडे नेता कोटे के हिसाब से आपस में सीट बांट लेते है कुछ पर तो सीट बेचने तक का आरोप लगता है. बिहार में स्क्रीनिंग में अविनाश पांडे को दिखावे के लिए रखा गये लेकिन असल में प्रदेश प्रभारी महासचिव शक्ति सिंह गोहिल और स्थानीय नेताओं ने टिकट बांट ली . एंकर रवीश कुमार के भाई ब्रजेश पांडे के रेप आरोपी होने पर नाम कटने के बाद भी फिर टिकट दे दी गयी . अचानक से आकर शरद यादव की बेटी और शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे का टिकट दे गयी . सवाल है कि जब तक ईमानदारी से जमीनी रिपोर्ट पर टिकट नहीं बंटेगी तो कैसे कांग्रेस जीतेगी. कांग्रेस को सबसे पहले टिकट वितरण की पूरी कवायद हो ही बदलना होगा . सर्वे कोई और करे, प्रभारी महासचिव और जिला अध्यक्ष अपने उम्मीदवार का नाम दे और स्क्रीनिंग कमेटी अंतिम फैसला ले. उसमें दिल्ली का दखल न हो . साथ ही सबकी जिम्मेदारी और दंड भी तय हो .</p>
<p>संगठन को मजबूत बनाये .</p>
<p>कांग्रेस को बीजेपी से ये तो सीखना ही होगा कि संगठन में किसी भी बाहरी को तब तक जगह नहीं जब तक वो साबित नहीं कर दे . टिकट भले ही जीतने वाले को मिले लेकिन संगठन उसी को जो पार्टी की विचारधारा से बंधा हो .साथ ही संगठन में काम करने वालों को चुनावी टिकट के अलावा बाकी फायदे दिये जायें ताकि वो लगातार काम करते रहें. संगठन को जाति के बजाय क्षमता के आधार पर बनाया जाये .</p>
<p>ये  दो सुधार भी अगर कांग्रेस ने कर लिये तो कांग्रेस की हालत बहुत हद तक बदल सकती है.</p>
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