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	<title>संदीप सोनवलकर &#8211; newsmantra.in l Latest news on Politics, World, Bollywood, Sports, Delhi, Jammu &amp; Kashmir, Trending news | News Mantra</title>
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		<title>शिवराज पाटिल चाकुरकर .. नेहरु की तरह कपड़ों के शौकीन थे &#8230;.</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Newsmantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Dec 2025 07:33:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[26/11 मुंबई आतंकी हमला]]></category>
		<category><![CDATA[कांग्रेस का इतिहास]]></category>
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		<category><![CDATA[सोनिया गांधी]]></category>
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					<description><![CDATA[वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर का आलेख इनको इसलिए चुना कि भारतीय राजनीति के आजादी के बाद के इतिहास में पंडित नेहरु के बाज शिवराज पाटिल चाकूरकर ही ऐसे व्यक्ति दिखायी देते हैं जो केवल आचरण और व्यवहार में ही नहीं कप़ड़ों से लेकर रहन सहन तक हर जगह साफ सफाई...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर का आलेख</strong></p>
<p>इनको इसलिए चुना कि भारतीय राजनीति के आजादी के बाद के इतिहास में पंडित नेहरु के बाज शिवराज पाटिल चाकूरकर ही ऐसे व्यक्ति दिखायी देते हैं जो केवल आचरण और व्यवहार में ही नहीं कप़ड़ों से लेकर रहन सहन तक हर जगह साफ सफाई और संयम का परिचय देते हैं .उनकी भाषा भी बहुत संयत और हमेशा तोल कर बोलते रहे पाटिल साहेब .. पंडित नेहरु के बारे में तो सुना ही है लेकिन शिवराज पाटिल से बहुत सी बातें करने का मौका मिला.</p>
<p>सन 2004-2008 की यूपीए सरकार के दौरान शिवराज पाटिल देश के गृहमंत्री भी रहे। 26/11 के मुंबई आतंकी हमले के बाद उन्होंने 30 नवंबर, 2008 को देश की सुरक्षा में हुई चूकों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था।</p>
<p>इससे जुड़े ही कुछ किस्से बताता हूं. बहुत कम लोगों को पता होगा कि शिवराज पाटिल असल में लिंगायत थे और वो कर्नाटक की लिंगायत एजुकेशन सोसायटी से बहुत करीबी से जुड़े हुये. वो उन बहुत कम लोगों में से थे जब राजीव गांधी के निधन 1991 के बाद से सोनिया गांधी ने खुद को 10 जनपथ में समेट लिया था और सीताराम केसरी सहित कुछ नेता गांधी परिवार को कांग्रेस से दूर ही रखना चाहते थे तब भी वो नियमित तौर पर जाकर सोनिया गांधी से मिलते थे और गांधी परिवार को हर तरह की मदद के लिए तैयार रहते थे . यहां तक कि सोनिगे या गांधी की राजनीती में एंट्री के लिए वो भी बहुत हद तक कारण रहे उन्होंने ही सोनिया गांधी को कहा था कि वो हर कदम पर साथ देंगे.</p>
<p>शिवराज पाटिल हमेशा से संयमित और अनुशासित रहे हैं. वो बताते थे कि खाना भी कम से कम 32 बार चबाकर खाना चाहिये .इसके लिए वो पूरा समय भी देते थे . चाहे वो पद पर रहे हों या नहीं वो हमेशा लोगों से अपाईंटमेंट देकर ही मिला करते थे . वो हमेशा सफेद या क्रीम कलर की ही शर्ट या पेंट पहनते थे .उनको इस बात की शिकायत रहती थी कि लोग उनके कपड़ों से उनका आंकलन करते हैं काम से नहीं .. जबकि लोकसभा स्पीकर से लेकर गृहमंत्री तक कई अहम कामों में उनका योगदान रहा.</p>
<p>एक बार संसद में वो एक आतंकी हमले की घटना पर जबाब दे रहे थे .. उनकी हिंदी मराठी मिश्रित ही थी .. राज्यसभा में वो जबाव दे रहे थे तो कहने लगे कि हम आतंकियों को कड़ी से कड़ी शिक्षा देंगे .इस पर राज्यसभा में हंगामा हो गया .. तब विपक्ष में बैठी बीजेपी के लोग ये कहकर विरोध करने लगे कि आतंकियों को सजा देने के बजाय पाटिल साहेब उनको शिक्षा देना चाहते हैं. बाद में उनको सफाई देनी पड़ी कि मराठी में शिक्षा का मतलब ही सजा होता है. इस बात पर राज्यसभा में ठहाके गूंजने लगे ..</p>
<p>उनके गृहमंत्री बनने की बात भी बड़ी निराली है .. वो जब 2004 का लोकसभा चुनाव उस्मानाबाद से लड़ रहे थे तब भी वो घऱ घर जाकर प्रचार नहीं करते थे उनका मानना था कि लोगों तक बात पहुंचनी चाहिये चुनाव मैनेजमेंट की जरुरत नहीं ..इतना ही नहीं एक जनसभा में तो उन्होंने कह दिया कि अगर किसी को नौकरी पाने या गली अथवा नाली सुधार की बात करनी हो तो मेरे पास मत आना ..सांसद का काम संसद में नीतिगत चर्चा और कानून बनाना होता है ये जमीनी काम तो विधायक और कारपोरेटर करेंगे मैं उनको फंड दे दूंगा. उनकी इसी बात पर तब के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुरुदास कामत ने मुझे कहा था कि ऐसी बात करेंगें तो पाटिल साहब कहां जीतेंगे ..</p>
<p>ये बात भी बहुत कम लोगों को पता होगी कि पाटिल साहेब को इस बात का इल्म था कि चुनाव जीतने पर अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो उनको ही अगला प्रधानमंत्री बनाया जायेगा .शायद उनको गांधी परिवार से इस बात का संकेत भी मिला हो.. पाटिल साहेब ने चुनाव से पहले ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर तब एनडीटीवी के पत्रकार समीरन वालवेकर की सलाह पर कुछ छोटी फिल्म भी बना रखी थी जिन पर वो अपनी राय दे रहे थे ..वो पीएम बनने की पूरी तैयारी कर रहे थे.लेकिन अपने स्वभाव और साफगोई के कारण चुनाव हार गये .</p>
<p>चुनाव के बाद संसद में जब कांग्रेस विधायक दल की बैठक होने वाली थी जिसमें सारे अधिकार सोनिया गांधी को दिये जाने थे .तो हार जाने के कारण पाटिल उस बैठक में नहीं जा रहे थे तब गुरुदास कामत उनको जबरदस्ती बुलाकर उस बैठक में ले गये&#8230; पाटिल साहब भी शायद नजरें नहीं मिला रहे थे और पीछे की कतार में जाकर बैठ गये .. सोनिया गांधी को उनके पीछे होने की बात पता चली तो पाटिल साहब को आगे की कतार में ले जाया गया और कुछ दिन बाद नाटकीय तरीके से जब मनमोहन सिंह को पीएम चुना गया तो दस जनपथ के विश्वासपात्र होने के नाते शिवराज पाटिल को गृहमंत्री बना दिया गया . पाटिल साहब का बंगला भी तब जनपथ पर शऱद पवार के बाजू में ही था. गृहमंत्री होने के नाते उनके घर पर वाच टावर लगा हुआ था तो शरद पवार हम पत्रकारों से अक्सर मजाक में कहते लगता है कांग्रेस ने जानबूझकर उनके बाजू में गृहमंत्री को बंगला दिया ताकि वो नजर रख सकें ..गांधी परिवार के करीबी होने के कारण पाटिल साहब की शरद पवार से नहीं बनती थी .</p>
<p>अब बात 26 नवंबर 2008 के हमले की जब मुंबई के ताज होटल और सीएसटी समेत कई जगहों पर पर हमले हुये तो पाटिल साहेब पर बड़ी जिम्मेदारी आ गयी .. हमले की सुबह ही हम लोग कैमरा लेकर उनके घर पहुंच गये .बड़ी मुश्किल से वो मीडिया पर बाईट देने तैयार हुए . उनके घर तब कोई पूजा थी .करीब आठ बजे वो बाईट देने आये तो क्रीम कलर का बंद गले का कोट पहने हुये थे.. उसके बाद वो हड़बड़ी में नहाने चले गये और आननफानन में पूजा करके निकलने लगे ..मीडिया वहां जमा ही हुआ था . लेकिन तब तक उन्होनें केवल सफेद रंग की शर्ट पहनी थी उसी में वो फिर बाईट देने आ गये.. इसके तुरंत बाद उनको संसद में एक बैठक में जाना था ..वो निकल ही रहे थी कि उनकी बहु अर्चना पाटिल ने उनको ब्राऊन रंग का कोट लाकर दे दिया वो उसे गाड़ी में ही पहनकर पहुंच गये वहां भी कैमरे लगे थे इस बार वो एक नये कोट में दिख रहे थे .. आजतक के दफ्तर में इसे बहुत बारीकी से देख रहे क्राइम रिपोर्टर शम्स ताहिर खान से जोर से चिल्लाकर कहा अरे ये तो फिर कपड़े बदल लिये .. बस इसी बात पर पाटिल ने हमले के दौरान भी बार बार कपड़े बदले ये हेडलाईन चलने लगी जिसका खामियाजा पाटिल को 30 नवंबर को इस्तीफा देकर करना पड़ा</p>
<p>इस हमले से जुड़े कुछऔर किस्से आगे आयेंगे लेकिन पाटिल साहेब पर उस दौरान ये भी आरोप लगाया गया कि हमले के 24 घंटे बाद तक भी वो सेना के कमांडो नहीं भेज पाये जिससे आंतकियों को ताज में और भी हमला करने का मौका मिला. बाद में पाटिल साहब से हमारी बात हुयी तो उन्होंने कहा कि वो संसदीय परंपरा में विश्वास रखते हैं जब तक राज्य सरकार की तरफ से अधिकारिक तौर पर सेना या कमांडो भेजने का आग्रह नहीं मिल जाता तो किसी राज्य में सेना नहीं भेज सकते थे . ये राज्य और संघ के अधिकार और शक्तियों का उल्लंघन होता . राज्य सरकार ने दोपहर तक ही आग्रह भेजा उसके बाद ही दिल्ली से विशेष विमान से कमांडो भेजे जा चुके .</p>
<p>पाटिल साहब को इस बात का हमेशा दुख रहा कि उन्हें बिना किसी वजह से दोषी बताया गया .उनका कहना था कि कुछ लोगों ने इस मौके पर भी जमकर राजनीति की ..यहां तक कि जब हमला चल रहा था तब भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने मुंबई पहुंचकर ताज के पास मीडिया से बात की थी. जबकि हालात खराब थे इसलिए कोई जवाब नहीं दिया गया .कपड़े बदलने और देरी के आरोप के बाद भी पाटिल साहब को इस्तीफा नहीं देना पड़ता लेकिन तब सरकार में शामिल होकर भी मौका देखने वाले शरद पवार ने एक तीर से कई शिकार कर दिये .. उन्होनें तब राज्य के गृहमंत्री आर आर पाटिल को कह दिया कि जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दें .. आर आर आबा ने इस्तीफा दे दिया तो सीएम विलासराव देशमुख को भी इस्तीफा देना पड़ा और इसी दवाब में आखिर शिवराज पाटिल को भी पद छोड़ना पड़ा .</p>
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		<title>भारत को डिटिजल बाजार क्यों बनाना चाहते हैं मोदी ..</title>
		<link>https://newsmantra.in/why-does-modi-want-to-make-india-a-digital-market/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Newsmantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 May 2025 07:31:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[News Mantra: Exclusive]]></category>
		<category><![CDATA[digital market]]></category>
		<category><![CDATA[Modiji]]></category>
		<category><![CDATA[Narendra Modi]]></category>
		<category><![CDATA[पीएम मोदी]]></category>
		<category><![CDATA[संदीप सोनवलकर]]></category>
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					<description><![CDATA[भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है.. हर बात में यहां तक कि मोबाईल चलाने वालों और उस पर दिन भर बिताने वालों में भी भारत दुनिया में नंबर एक हैं.. करीब 140 करोड की आबादी वाले देश में 80 करोड़ के आस पास मोबाईल यूजर हैं. ऐसे...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है.. हर बात में यहां तक कि मोबाईल चलाने वालों और उस पर दिन भर बिताने वालों में भी भारत दुनिया में नंबर एक हैं.. करीब 140 करोड की आबादी वाले देश में 80 करोड़ के आस पास मोबाईल यूजर हैं. ऐसे में पीएम मोदी ने मुंबई में एक से चार मई तक दुनिया भर के मनोरंजन उघोग और डिटिजल तकनीक के सबसे बडे सम्मेलन वेव्स 2025 का आयोजन किया .. इसमें क्या हासिल हुआ बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर</p>
<p>मुंबई के व्यापारिक हब माने जाने वाले जियो सेंटर बीकेसी मे एक से चार मई तक अगर आप एक नजर दौड़ाते तो आपको लगता कि मनोरंजन की दुनिया और डिटिजल की दुनिया का एक साथ मिलन हो रहा है . चार दिन में यहां जुटे एक लाख से ज्यादा लोगों और शाहरुख से लेकर आलिया भटट और रणबीर सिंह से लेकर सैफ अली खान जैसे सितारों ने डिजीटल होने के कारण बदल रही मनोरंजन की दुनिया पर बात की और ये भी तय किया कि भारत को दुनिया का सबसे बड़ा डिटिजल कंटेट क्रिएटर बनाना है .इसके लिए बाकायदा एक अलग यूनिवर्सिटी बनाने का ऐलान भी किया गया. लेकिन ये सवाल हमेशा तैरता रहा कि ऐसा क्या है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान से आतंकवाद को लेकर भारत में जवाबी तैयारी चल रही है और तनाव बढ़ता जा रहा है तब मुंबई में ये डिजिटल आयोजन की जरुरत क्यों लगी और हर बात सोच समझकर करने वाले पी एम मोदी ये सब क्यों कर रहे है.<br />
तमाम विशेषग्यों की बातचीत में कुछ बातें निकलकर आयी वो इस तरह है कि ..</p>
<p>1. मोदी समझते है कि भारत में मोबाईल और उसके मनोरंजन ने किस हद तक पैठ बना ली है और भारत में कंटेट क्रिएटर का बाजार तेजी से बढ रहा है .भारत के अधिकतर युवा रील और शार्ट दिन में एक बार तो देखते हैं. पीएम मोदी को लगता है इस फोर्स को दो तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है पहला कंटेट क्रिएटर के रोजगार के तौर पर इससे बड़ी संख्या मे युवाओं को रोजगार मिल सकता है .. दूसरा इन युवाओं को प्लेटफार्म देकर अपने साथ जोड़े रखना ताकि ये उनका समर्थक भी बना रहे ..</p>
<p>2. भारत मे ओटीटी ने अब काफी हद तक सिनेमाघऱ के पैरलल अपनी जगह बना ली है .बहुत से लोग वीकेंड में घर पर ही ओटीटी देखते हैं. यहां तक कि इस माध्यम पर फिल्में भी सीधे रिलीज होने लगी है लेकिन ये भी इतना ही सच है कि ओटीटी पर अब भी दो विदेशी प्लेटफार्म नेटफिल्क्स और अमेजान की ही पकड़ है. 70 फीसदी लोग इनको ही देखते हैं और इसमें कंटेट ज्यादातर विदेशी ही है.. पीएम मोदी औऱ संघ परिवार चाहता है कि मनोरंजन की इस दुनिया में भारतीय कहानियां और और भारतीय कंटेट हो.इसके जरिये भारतीय परंपरा और कहानियों को सीधे घरों तक पहुंचाया जा सकेगा. ये काफी हद तक भारतीय गौरव को फिर से स्थापित करने के लक्ष्य में काम आयेगा .. अंबानी घराना जियो के जरिये जल्दी ही 5 जी रोल आउट करना चाहता है उसके जरिये एक खालिस भारतीय ओटीटी को पहुंचाया जा सकता है और उसके लिए कंटेंट लगेगा . इस पर वेव्स में खासा जोर भी रहा और ब्रम्रहा जैसी तकनीकी कंपनियां भी रियल टाइम वर्चुअल क्रिएशन को प्रमोट करती रहीं. यहां तक कि एक बाक्स में अभिताभ बच्चन जियो की तरफ से रामायण का वाचन करते हुए वर्चुअल बने रहे ..</p>
<p>3. इन सबके साथ ही एक और मकसद इस पूरे आयोजन का रहा वो था गेमिंग बाजार को साधना.. भारत में फन गेम्स और वर्चुअल गेम्स का बाजार तेजी से बढ रहा है ..इस बाजार में अकेले ड्रीम स्पोर्टस का ही बाजार एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. इसके अलावा रमी और लूडो जैसे बाकी गेम्स भी जमकर कमाई कर रहे हैं. इनको स्पोर्टस का दर्जा देकर इन पर लगने वाली बोली को भी सटटे से बचाकर अलग कर दिया गया है. इस सबसे ही भारत सरकार को करीब एक लाख करोड़ रुपये की जीएसटी मिलती है.. हालांकि इस पर विवाद चल रहा है. गेमिंग स्पोर्टस कंपनियों का कहना है कि उन पर 18 फीसदी की दर से जीएसटी लगायी जाये जबकि सरकारी विभाग अभी 28 फीसदी मांगता है.. ये एक बहुत बड़ा बाजार है और साथ ही लोग अगर लगातार गेम और बाकी चीजों में उलझे रहें तो बाकी सवाल पर बहुत कम ही उबाल आयेगा..</p>
<p>4. इसके साथ ही मनोरंजन की दुनिया का बाजार डिजीटल होने के कारण अब वैश्विक हो चला है . ये अब यूट्यूब और रील्स से भी आगे बढ चला है .इसमें रोजगार और कमाई दोनों की संभावना है और सरकार इसे एक बड़ा उघोग बनाकर युवाओं को अवसर देना चाहती है.. वेव्स में इस पर भी बहुत बात हुयी ..</p>
<p>5. वेव्स में एक नये सेंगमेंट कम्युनिटी रेडियो और पाडकास्ट पर भी अलग से चर्चा हुयी . कम्युनिटी रेडियो चलाने वाले देशभर के 350 लोगों को भी बुलाया गया और आईआईएमसी के जरिये इस पर परिचर्चा हुयी लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया कि इन कम्युनिटी रेडियो को किस तरह से आर्थिक तौर पर सक्षम बनाया जा सके ..ज्यादातर रेडियो अभी सरकारी मदद के सहारे ही चल रहे है और इनकी लाइसेंस की फीस भी बहुत ज्यादा है.जबकि विदेशों में ये बहुत लोकप्रिय है.. भारत में अभी इनकी पहुंच करीब पांच किलोमीटर ही है और कापीराइट से लेकर कंटेट बनाने तक सबके खर्चे बहुत है.. इसलिए इनकी चुनौतियां कम नहीं है ..पाडकास्ट जरुर यूटूब पर लोकप्रिय हो रहा है लेकिन मोबाईल पर आडियो पाडकास्ट को लेकर अब भी लोकप्रियता कम है और इसका बाजार भी बहुत बड़ा नही हैं. मोदी बहुत दूर की देख रहे हैं.</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि यहां मुंबई में 100 से अधिक देशों के कलाकार, निवेशक और नीति निर्माता एक साथ एक ही छत के नीचे एकत्र हुए हैं। एक तरह से आज यहां वैश्विक प्रतिभा और वैश्विक रचनात्मकता के एक ईको-सिस्टम की नींव रखी जा रही है।</p>
<p><strong>बीती एक सदी में भारतीय सिनेमा ने भारत को दुनिया के कोने-कोने में ले जाने में पाई सफलता</strong></p>
<p>पीएम मोदी ने आगे कहा- ”वर्ल्ड ऑडियो विजुअल और एंटरटेनमेंट समिट यानी वेव्स.. ये सिर्फ एक ऐक्रोनिम नहीं है। ये एक वेव है- संस्कृति की, रचनात्मकता की। वेव्स एक ऐसा वैश्विक मंच है, जो आप जैसे हर कलाकार, हर निर्माता का है। जहां हर कलाकार, हर युवा एक नई योजना के साथ रचनात्मक दुनिया के साथ जुड़ेगा। आज 1 मई है। आज से 112 साल पहले 3 मई, 1913 को भारत में पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र रिलीज हुई थी, इसके निर्माता दादासाहेब फाल्के जी थे और कल ही उनकी जन्म जयंती थी। बीती एक सदी में भारतीय सिनेमा ने भारत को दुनिया के कोने-कोने में ले जाने में सफलता पाई है।”</p>
<p><strong>सभी का प्रयास आने वाले वर्षों में वेव्स को देगा नई ऊंचाई</strong></p>
<p>उन्होंने अपने संबोधन में आगे कहा- ”आज वेव्स में इस मंच पर हमने भारतीय सिनेमा के अनेक दिग्गजों को डाक टिकट के माध्यम से याद किया है। बीते वर्षों में मैं कभी गेमिंग वर्ल्ड, कभी म्यूजिक की दुनिया के लोगों से, फिल्म मेकर्स से मिला, कभी स्क्रीन पर चमकने वाले चेहरों से मिला। इन चर्चाओं में अक्सर भारत की रचनात्मकता, सृजनात्मक क्षमता और वैश्विक सहयोग की बातें उठती थीं। लाल किले से मैंने ‘सबका प्रयास’ की बात कही है। आज मेरा ये विश्वास और पक्का हो गया है कि आप सभी का प्रयास आने वाले वर्षों में वेव्स को नई ऊंचाई देगा।”</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दावोस ने बताया ये दुनिया मांगे मोर</title>
		<link>https://newsmantra.in/davos-told-that-this-world-demands-more/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Newsmantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jan 2025 12:35:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[News Mantra: Exclusive]]></category>
		<category><![CDATA[Davos]]></category>
		<category><![CDATA[दावोस]]></category>
		<category><![CDATA[संदीप सोनवलकर]]></category>
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					<description><![CDATA[दावोस से लौटकर संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार दुनिया के सबसे खूबसूरत देश माने जाने वाले स्विटजरलैंड के शहर ज्यूरिख से करीब 260 किलोमीटर दूर बर्फ से ढकी पहाड़ों में इस बार जब माइनस सात डिग्री के मौसम में जब पूरे विश्व से उघोगपति और इकानामिस्ट जुटे तो सबके मन में...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दावोस से लौटकर संदीप सोनवलकर वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p>दुनिया के सबसे खूबसूरत देश माने जाने वाले स्विटजरलैंड के शहर ज्यूरिख से करीब 260 किलोमीटर दूर बर्फ से ढकी पहाड़ों में इस बार जब माइनस सात डिग्री के मौसम में जब पूरे विश्व से उघोगपति और इकानामिस्ट जुटे तो सबके मन में यही चिंता थी अब आने वाले 25 साल में दुनिया कैसी होगी. दावोस के 21 से 24 जनवरी के प्रवास में मुझे समझ आ गया कि ये सम्मेलन केवल पर्यावण और सतत विकास के नारों के साथ होने वाले बाकी सम्मेलनों से कितना अलग है क्योंकि इस सम्मेलन में बात केवल पर्यावरण और विकास की नहीं हो रही थी बल्कि दुनिया भर में बदलते माहौल और चुनौतियों के दायरे में हर बात पर बात होती रही.<br />
कोविड जैसी भयानक बीमारी के पांच साल बाद हो रहे इस सम्मेलन में भी इस बात पर चर्चा होती रही कि कोविड में क्या सिखाया और आगे दुनिया कैसी होगी. ये बात सबने स्वीकार की कि कोविड ने दिखा दिया कि मानवीय जिंदगी ही सबसे पहली प्राथमिकता है और इसलिए हर विकास में उसको केंद्र मे रखना जरूरी है. इसके साथ ही दुनिया भर में ग्रोथ में आयी कमी .बचत में कमी . मंहगाई में तेजी और अमीर गरीब की खाई के मुददे पर भी बात हुयी . सबने ये माना कि कोविड के बाद के पांच सालों में दुनिय बहुत बदल गयी है खासतौर पर वसुधैव कुटुंम्बक या ग्लोबल विलेज के बजाय लोकल से ग्लोबल की बात होने लगी है और हर कोई खुद के नेशन फर्सट की बात कर रहा है .</p>
<p><strong>चूक गया भारत ..</strong></p>
<p>दुनिया भर का सबसे बड़ा आर्थिक सम्मेलन होने के बावजूद भारत इस बार इसमे चूक गया हालांकि सबसे ज्यादा लोग भारत से ही इसमें शामिल हुये और सबसे ज्यादा भारतीय राजयों के स्टाल इसमें दिखे लेकिन भारत की तरफ से विश्व खासतौर पर गैर अमरीकी देशों के साथ आर्थिक रिश्तों को बढ़ाने की मजबूत पहल नहीं दिखी. अमरीका में नये राष्ट्रपति ट्रंप के आगाज के कारण वो खुद तो इस सम्मेलन में नहीं आये लेकिन उनकी धमक हर जगह सुनायी दी . पूरा सम्मेलन में इस बात पर चर्चा होती रही ट्रंप के आने का दुनिया भर की इकानामी पर क्या असर होगा.</p>
<p>इधर पूरे सम्मेलन में सबसे ज्यादा भारतीयों ने हिस्सा लिया .कुछ लोग तो मजाक में कहते सुनाई दिये कि ऐसा लग रहा है कि प्रगति मैदान दिलली के किसी सम्मेलन में आ गये हैं. अगर भारतीय नहीं आते तो सम्मेलन फीका हो जाता ..इसके बाद भी भारत का एक देश के तौर पर सम्मेलन में असर कम ही दिखा. रेल मंत्री और आईटी मंत्री अश्वनि वैष्णव के साथ जूनियर मंत्री चिराग पासवार .रामा नाय़डू और जयंत चौधरी जरुर आये लेकिन सब बस किसी न किसी फेडरेशन के लंच या डिनर की औपचारिकता दिखाते नजर आये . भारत के पास अवसर था कि ऐसा सम्मेलन जहां पर अमेरिका मौजूद न हो वहां वो यूरोप और बाकी दुनिया के साथ आर्थिक रिश्तों को नया आयाम देता लेकिन ऐसा हो न सका .</p>
<p>सम्मेलन में कुछ राजयो के भी पैवेलियन थे लेकिन केवल महाराष्ट्र की छाप ही दिखी जो पंद्रह लाख करोड़ से ज्यादा के निवेश के प्रस्तावों पर समझौता कर सका वहीं आध्रप्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यो के सीएम बस औपचारिकता बस करते रहे . इतना ही नहीं बाकी कुछ राज्यो में तो सीएम ने आना तक गवारा नहीं समझा. भारतीय नीतिकारों को शायद समझना होगा कि भले ही ये एक गैर सरकारी आयोजन था लेकिन यहां पर जिस तरह से निवेशकों और उघोगपतियो के साथ इकानामिक जानकारों और ए आई के पैरोकारों का जमावड़ा था वहां भारत बहुत कुछ कर सकता था.</p>
<p><strong>यूरोप की चुनौतियां</strong></p>
<p>सम्मेलन में यूरोपियन यूनियन के सेंट्रल बैक की प्रमुख क्रिश्चियन लेगार्डे ने कहा कि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है और ये समय है जब पूरी दुनिया में फिर से जाग जाने का समय आ गया है. एक तरफ खुद को बहुत ही मजबूत और सबसे बड़ा बताने वाला अमरीका अपनी दादागिरी चलाना चाहता है तो दूसरी तरफ चीन लगातार अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है ऐसे में यूरोप और एशिया के बाकी देशों को अपने भविषय को लेकर कुछ सोचना होगा. दुनिया में अब समय गया है कि हम खुद के अपने देश और कल्चर पर गर्व ही न करें बल्कि उसको जोर शोर से बताकर अपनी मौजूदगी का अहसास भी करायें. अब दुनिया में निर्णायक लेकिन समावेशी और बदलावकारी लेकिन सृजनात्मक लीडरशिप की जरुरत है. कोई भी चूक कोविड से बड़ी तबाही ला सकती है.<br />
यूरोप के देशों के सामने सबसे बड़ा संकट आर्थिक प्रगति और अपने उच्च जीवन स्तर को बनाये रखने का है . उनके सामने गैस का संकट है और उसी के चलते मंहगाई दर बढ़ी है .जर्मनी जैसे समृदध देश में भी अब ग्रोथ निगेटिव मे जा सकती है तो यूरोप के कई देश नई टेक्नालाजी के वार में पिछड़ते दिख रहे हैं.</p>
<p><strong>एशियाई मार्केट में मांग और सप्लाई पर जोर</strong></p>
<p>सम्मेलन में बताया गया कि एशियाई मार्केट डिमांड के हिसाब से अब सबसे बड़ा मार्केट है लेकिन ज्यादातर एशियाई देश मंहगाई और रोजगार के संकट से गुजर रहे है जिसका असर उनकी इकानामी पर हो रहा है . तेजी से प्रगति के नाम पर अंधाधुंध विकास की भी अब सीमा हो गयी है . ऐसे में चीन एक बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर तो उभरा है लेकिन उसका फायदा एशिया के किसी और देश को नहीं मिल रहा है .चीन लगातार विकास दर बनाये हुये है लेकिन जापान और भारत जैसे देशों के सामने ग्रोथ की चुनौतिया है. वहीं पाकिस्तान,अफगानिस्तान , बंगलादेश जैसे देश अस्थिता के दौर में है . ऐसे में एशियाई मार्केट में अभी कछ सालो तक चीन की बादशाहत बनी रहेगी .अगर अमेरिका पाबंदी लगाता है तो भी चीन के पास एशियाई देशों का एक बड़ा मार्केट बना रहेगा .</p>
<p><strong>एआई और उसके असर</strong></p>
<p>सम्मलेन में एक बड़ा मुददा ए आई और उसके दुनिया पर असर पर बात होती रही .दुनियाभर की सारी बड़ी टेक कंपनियों ने एआई में निवेश और उसके फायदों पर बात की . बात ये निकलकर आयी कि एआई से प्रगति की रफ्तार तो बढ सकती है लेकिन साथ ही बेसिक को मजबूत करना भी उतना ही जरुरी है. एआई को ह्यूमन से रिप्लेस नही किया जा सकता और एआई को बहुत बढ़ाकर बताना भी खतरे से खाली नहीं है . सम्मेलन के खतम होने के साथ ही चीन ने नयी डीप सीक एआई का खुलासा करके दुनिया भर की कंपनियों और इकानामी में तूफान ला दिया . चीन ने दिखा दिया कि एआई के युदध में वो पीछे नहीं रहेगा. भारत की इन मंचों पर मौजूदगी केवल नौकरी के अवसर देने तक ही सीमित रही लेकिन निवेश और सुपर चिप्स के बारे में बहुत कुछ कहा नहीं जा सका . बस यही कहा गया कि भारत एक बेहतर मेनपावर सप्लाई के लिए हब बन सकता है . जबकि सबने ये माना कि भारत इसका बहुत बड़ा बाजार है और भारत में लोगों ने इसको अपनाना शुरु कर दिया है.</p>
<p><strong>एनर्जी पर बात</strong></p>
<p>सम्मेलन में एनर्जी पर जमकर बात हुयी . सबने ये माना कि एनर्जी के बिना ग्रोथ नहीं हो सकती. सोलर एनर्जी पर भारत के विकास की बात हुयी लेकिन ये बताया की इस पर चौबीस घंटे डिपेंडेसी या औगोघिक विकास संभव नहीं है इसलिए हाइड्रोजन और बाकी विकल्पों पर ध्यान देना होगा .सबसे ज्यादा बात हुयी बैटरी सेल और एनर्जी के स्टोरेज पर काम करना होगा.अकेले भारत में इस साल इस सेक्टर में तीस लाख करोड़ का निवेश होना है . दुनिया भर में भारत एनर्जी का सप्लायर बन सकता है लेकिन उस पर बहुत कुछ होना बाकी है. यूरोप में इस बार एनर्जी का संकट कुछ हद तक सुधरा है लेकिन अब भी उसका असर हो रहा है . खासतौर पर जुलाई के बाद के ठंड के मौसम के लिए यूरोप अभी से घबरा रहा है . ऐसे में दुनिया भर के देशों को इस बात पर सोचना होगा .भारत में अब भी 90 प्रतिशत बिजली कोल यानि थरमल पावर से बनती है भारत के पास अगले 400 सालों तक का कोल भंडार है ऐसे में भारत एनर्जी के पाल्यूशन और ग्रीन एनर्जी पर कितना भरोसा कर सकता है. ऐसे कई सवाल सम्मेलन में उठ सकते थे लेकिन बात कम ही हो पायी ..</p>
<p>कुल मिलाकर इस आर्थिक सम्मेलन से दो बातें उभरकर आयी कि कोविड के बाद की अगर ग्रोथ की रफ्तार को कायम रखना है तो दुनिया के अमीर गरीब दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा . दूसरा विकास के साथ साथ लोगों की जिंदगी आसान बनाने और पर्यावरण की चिंता करने पर भी उतना ही ध्यान देना होगा .एक देश या एकतरफा ग्रोथ किसी देश का भला नहीं कर सकती . मगर मुश्किल ये है ऐसे दौर में जब सारे बड़े नेता मैं और मेरा देश की बात कर रहे हैं तो उनको साथ में लाना आसाना नहीं होगा .</p>
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		<title>राहुल की महाराष्ट्र पदयात्रा के मायने, सच में कोई फायदा है क्या</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Newsmantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Nov 2022 07:40:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[पदयात्रा]]></category>
		<category><![CDATA[राहुल]]></category>
		<category><![CDATA[संदीप सोनवलकर]]></category>
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					<description><![CDATA[संदीप सोनवलकर, वरिष्ठ पत्रकार हाल ही में दिवंगत समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव निजी बातचीत मे अक्सर कहा करते थे कि नेता तब तक ही सामयिक है जब तक उसके बारे में चर्चा और पर्चा दोनों होते रहे .. यानि मीडिया में खबर छपे और लोगों मे चर्चा हो ....]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>संदीप सोनवलकर, </strong><strong>वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p>हाल ही में दिवंगत समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव निजी बातचीत मे अक्सर कहा करते थे कि नेता तब तक ही सामयिक है जब तक उसके बारे में चर्चा और पर्चा दोनों होते रहे .. यानि मीडिया में खबर छपे और लोगों मे चर्चा हो . नेता जी ये बात अपने ठेठ अंदाज में कही थी लेकिन राजनीती का यही सौ आने सच है .. ये सच अब शायद राहुल गांधी ने समझ लिया है. लगातार हार के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में ट्रोल होने के बाद राहुल गांधी को समझ में आ गया है कि अगर उनको लोगों के बीच अपनी छवी बदलनी है तो कुछ तो करना ही होगा . इसलिए ही वो भारत यात्रा पर निकल पड़े है I</p>
<p>असल में नेशनल मीडिया और सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल करके राहुल की छवि एक नासमझ युवा और राजनीति में बेमन से शामिल राजपुत्र की बना दी गयी .ऊपर से बार बार ही हार , कांग्रेस की आपसी कलह. राहुल का अचानक छुटटी पर चले जाना सब इसमें तड़के लगाता रहा इसलिए बीजेपी और उनके समर्थक राहुल के बारे में सब सही गलत कहते रहे और धीरे धीरे उनकी छवि नाकारा और नासमझ की बना दी गयी . मजे की बात ये कि राहुल ने जब इसे बदलने के लिए कोशिश करना शुरु किया तो चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर ने ही अपने प्रेजेंटेशन में इस भारत ज़ोड़ो यात्रा का नाम और पूरा फ्रेमवर्क दिया था .. किशोर इसे खुद लागू करना चाहते थे लेकिन पार्टी के बड़े नेताओं ने उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया और राहुल खुद यात्रा पर निकल पड़े I</p>
<p>अब जाहिर है कदम कदम पर इसका सवाल किया जा रहा है कि क्या राहुल की यात्रा के फायदे होंगे या फिर सिर्फ दिखावा है . राहुल अब भी नेशनल मीडिया पर तभी दिख रहे है जब कोई विवादित बयान दे रहे हैं लेकिन इस यात्रा के जरिये सोशल मीडिया पर जरुर छाये हुये हैं.असल में सोशल मीडिया की मजबूरी यही है कि इसमें नया कंटेंट हो तभी उसे लोग देखते हैं. पीए मोदी प्रिंट से लेकर नेशनल मीडिया पर लगातार छाये रहते हैं ऐसे में उनको सोशल मीडिया पर भी देखना बोर करता है .नया युवा जो तुरत फुरत कमेंट और लगातार बदलाव चाहता है उसे राहुल का ये अंदाज लुभा रहा है . उसे राहुल की टी शर्ट से लेकर किसी का भी हाथ पकडकर चलना बुरा नहीं बल्कि सही लग रह है .कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार सही कह रहे है कि ये चुनावी नहीं राजनीतिक यात्रा है इस यात्रा का चुनाव में अभी फायदा भले तुरंत नहीं मिले लेकिन लगातार चर्चा के कारण कांग्रेस को राजनीतिक फायद जरुर मिलेगाI .</p>
<p>अभी राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पहले खुद की छवी बदले और पार्टी की राजनीतिक सामयिकता बनाये रखे .. ये यात्रा दोनों मायने में उनके लिए फायदे मंद है .. पहला तो ये कि वो रोज नया कंटेंट दे रहे है जिसे खूब देखा जा रहा है दूसरा पार्टी के उस कैडर से मिल रहे है जो लगातार हार के कारण निराश हो चुका था .जरुरत सिर्फ इतनी है कि राहुल इस यात्रा के बाद भी इसी तरह मिलते रहे तो बहुत कुछ हो सकता है I</p>
<p>जहां तक महाराष्ट्र में राहुल की यात्रा का सवाल है तो वो राज्य में 13 दिन बिता रहे है जिसमें वो मराठवाड़ा , विदर्भ और उत्तर महाराष्ट्र के इलाकों से निकलेगे.. यहां बहुत राजनीतिक फायदा अभी तब दिखेगा जब चुनाव होगा लेकिन यात्रा के बहाने ही सही राहुल गांधी महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं को एक साथ लाने में तो कामयाब हो ही गये है. इतना ही नहीं सरकार जाने के बाद भी गठबंधन को आगे चलाने के लिए जरुरी संवाद के तौर पर वो शऱद पवार , सुप्रिया सुले और आदित्य ठाकरे के साथ भी बात कर चुके है .इससे ये संदेश तो गया है कि ये गठबंधन आगे भी चलता रहेगा .इसका फायदा तुरंत के तौर पर स्थानिय निकाय चुनाव में मिल सकता है. इसके साथ ही अगले चुनाव की तैयारी की ऊर्जा भी पार्टी के कैडर को मिल सकती है I</p>
<p>राहुल की पदयात्रा से इतना तो साफ दिख रहा है कि बीजेपी को समझना होगा कि अगर राहुल अपना और पार्टी के लिए लोगों को नजरिया बदलने में कामयाब हो जाते है तो लोकसभा के चुनाव आते आते कांग्रेस राष्ट्रीय तौर पर फिर से अपनी खोई हुयी जमीन पर कुछ फसल उगाने में कामयाब हो सकती है I</p>
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		<title>राहुल गांधी की अदूरदर्शी सोच का नतीजा है राजस्थान कांग्रेस का राजनीतिक कलह</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Newsmantra]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Sep 2022 09:25:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Political]]></category>
		<category><![CDATA[अशोक गहलोत]]></category>
		<category><![CDATA[बीजेपी]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक विश्लेषक]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्थान कांग्रेस]]></category>
		<category><![CDATA[सचिन पायलट]]></category>
		<category><![CDATA[संदीप सोनवलकर]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान कांग्रेस में मचे घमासान के संदर्भ में बीजेपी ने भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी पर तंज कसा है कि भारत जोड़ते रहना, पहले राजस्थान तो जोड़ लो&#8230;! संदेश साफ है कि राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अभी और परिपक्व होना बाकी है। क्योंकि सचिन पायलट को...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>राजस्थान कांग्रेस में मचे घमासान के संदर्भ में बीजेपी ने भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी पर तंज कसा है कि भारत जोड़ते रहना, पहले राजस्थान तो जोड़ लो&#8230;! संदेश साफ है कि राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से अभी और परिपक्व होना बाकी है। क्योंकि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की अगर वे जिद न करते और कांग्रेस का अखिल भारतीय अध्यक्ष बनने से पहले ही अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का संदेश नहीं देते, तो राजस्थान कांग्रेस में यह जो बवाल मचा हुआ है, वह कतई नहीं मचता।</p>
<p>राजस्थान के लगभग 90 फीसदी कांग्रेस विधायकों ने पायलट के लिए लक्ष्मण रेखा खींच दी है। कह दिया है कि पायलट कतई मंजूर नहीं, उनके अलावा कोई भी समर्पित नेता चलेगा। चार छह विधायकों को अपने साथ लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा करनेवाले पायलट के बारे में कांग्रेस में किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी कि उनके विरोध में एक साथ 92 विधायक सीधे इस्तीफा लिखकर कांग्रेस आलाकमान के सामने आंखें तरेरकर खड़े हो जाएंगे।</p>
<p>भारतीय लोकतंत्र में संभवत: यह पहली बार, और राजस्थान में तो सच में पहली बार हुआ है कि किसी प्रदेश में एक पार्टी के लगभग सभी विधायकों ने एक साथ अपना इस्तीफा दे दिया हो। सोनिया गांधी सन्न हैं, प्रियंका गांधी हत्तप्रभ हैं, और सदा की तरह राहुल गांधी इतने बड़े और गंभीर मामले के बावजूद खुद को दूर खड़ा दिखा रहे हैं, जैसे उनको इस सबसे कोई मतलब नहीं है। ताजा हालात यह है कि पायलट के नाम पर राजस्थान में कांग्रेस दो फाड़ हो गई है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले ही उनसे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा करवाए जाने और उनकी जगह पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की राहुल गांधी की उतावली में कांग्रेस का जो कबाड़ा हो रहा है, उसमें कांग्रेस के लिए इससे ज्यादा बुरा और कुछ भी नहीं हो सकता था।</p>
<p><strong>25 सितंबर को हुआ सितम </strong></p>
<p>सितंबर की 25 तारीख, रविवार को जब सुबह का सूरज उगा, तो पायलट लगभग मुख्यमंत्री जैसे उतावले अंदाज में विधायकों से मिल रहे थे और उनके समर्थकों को उनमें एक नए सूरज के उदय का आभास हो रहा था। इसके उलट, जैसा कि कुछ भी बड़ा करने से पहले अशोक गहलोत भगवान का आशिर्वाद लेते हैं, इस दिन भी वो अपने प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास के साथ पाकिस्तान बॉर्डर पर स्थित तनोट माता का आशीर्वाद लेने गए थे। पायलट के समर्थक भले ही यह आरोप लगा रहे हैं कि जादूगर गहलोत ने जयपुर इसलिए छोड़ा क्योंकि उन्हें अपने राजनीतिक पराक्रम का जादू दिखाना था और किसी भी हाल में पायलट को मुख्यमंत्री बनने से रोकना था। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि अशोक गहलोत की निष्ठा और पार्टी के प्रति समर्पण पर भरोसा किया जाना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में किसी भी अन्य नेता के मुकाबले गहलोत राजनीति की बारीकियां ज्यादा अच्छी तरह से समझते हैं। सोनवलकर कहते हैं कि राजस्थान के ताजा संकट से संकेत साफ है कांग्रेस को फिलहाल फूंक फूंक कर कदम रखना होगा।</p>
<p>कांग्रेस की राजनीति के जानकार अभिमन्यु शितोले की राय में राजस्थान के ताजा संकट के लिए कांग्रेस नेतृत्व की हड़बड़ी ज्यादा जिम्मेदार है, क्योंकि अगर 97 विधायकों की भावना को दरकिनार करके सिर्फ 16 विधायकों के समर्थनवाले पायलट को मुख्यमंत्री बनाना ही था, तो पहले गहलोत व उनके समर्थक विधायकों को विश्वास में लेना चाहिए था। शितोले यह भी कहते हैं कि कांग्रेस का अध्यक्ष पद पाने से पहले ही गहलोत को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवाने की बात भी एक तरह से गहलोत जैसे बड़े नेता के लिए बेहद अपमानजनक है, जिसे सहन करना उनके समर्थकों के लिए तो क्या, किसी के लिए भी आसान नहीं था। जैसलमेर से गहलोत जब वापस जयपुर पहुंचे, तो शाम ढलते ढलते माहौल ऐसा बदला कि कांग्रेस प्रभारी अजय माकन और दिग्गज नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी दंग रह गए। विधायकों ने पायलट की मुख्य़मंत्री पद पर दावेदारी के खिलाफ जो मजबूत माहौल रचा, वह इससे पहले किसी ने नहीं देखा। विधायक दल की बैठक में जाने से पहले दिग्गज मंत्री शांति धारीवाल के आवास पर बैठक हुई और वहीं से इस्तीफे लिखकर विधानसभा अध्यक्ष को भेज दिए। माकन और खड़गे विधायक दल की बैठक में विधायकों के आने का इंतजार ही करते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री आवास पर उस बैठक में पायलट समर्थक विधायक ही पहुंचे। कांग्रेस के 97 विधायक पहुंचे ही नहीं और इस्तीफे का एलान कर दिया। तो, मुख्यमंत्री गहलोत ने भी आलाकमान के सामने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि अब उनके बस में कुछ नहीं है।</p>
<p>बेबस प्रभारी अजय माकन और लाचार पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे को समझ में आ गया कि कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में अशोक गहलोत की दावेदारी के बाद राजस्थान में शुरू हुई हलचल अब सियासी तूफान में बदल गई है। विधायकों के इस रुख से हाईकमान हैरान है। सोनिया गांधी के कहने पर केसी वेणुगोपाल ने गहलोत और खड़गे से कहा कि रात भर में पूरे मामले को सुलझाया जाए, लेकिन आम बोलचाल की भाषा में कहें, तो रायता इतना फैल गया है कि मामला संभाले नहीं संभल रहा। रातभर में 80 विधायकों से मिलकर उनकी राय जानी गई लेकिन तस्वीर साफ है कि आनेवाले कई दिनों तक यह राजनीतिक संकट सुलझेगा नहीं। लग तो यही रहा है कि पायलट तब तक मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, जब तक कि गहलोत और उनके समर्थक नहीं चाहेंगे।</p>
<p>राजस्थान संकट के पीछे राहुल गांधी का पायलट प्रेम? मुख्यमंत्री गहलोत और पायलट के बीच कड़वाहट किसी से छिपी नहीं है। सन 2018 में पायलट स्वयं को मुख्यमंत्री मानकर चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन बहुमत न आने के कारण गहलोत ने मोर्चा संभाला और निर्दलियों व बसपा आदि के साथ कांग्रेस की सरकार बनाई, तो पायलट मुख्यमंत्री नहीं बन सके। तभी से पद पाने की चाह में पायलट रास्ता भटक गए और बीजेपी के हाथ का मोहरा बनकर बगावत करके सरकार गिराने की कोशिश में मानेसर जाकर बैठ गए। गहलोत ने बड़ी कोशिशों से सरकार बचा ली और पायलट व बीजेपी की साजिश को सफल नहीं होने दिया। यह सन 2020 की बात है, उस बगावत के बाद से ही पायलट सभी को खटकते रहे हैं, खासकर गहलोत को।</p>
<p>अब राहुल के जरिए मुख्यमंत्री बनने की पायलट की यह दूसरी कोशिश भी नाकाम होती लग रही है। इसीलिए पायलट समर्थक गहलोत पर विधायकों को भड़काने व बगावत के आरोप लगा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के प्रति गहलोत की निष्ठा, समर्पण व ईमानदारी पर शक करने को राजस्थान में तो किसी राजनीतिक पाप की तरह ही देखा जाता है। वैसे, राजनीति में कब क्या हो जाए, कोई नहीं कह सकता, लेकिन ताजा घटनाक्रम से अब यह लगभग तय माना जा रहा है आगे भले ही कुछ भी हो, लेकिन राजस्थान में पायलट की राजनीतिक राह आसान नहीं है। हालांकि इस घटनाक्रम में भाजपा द्वारा कांग्रेस पर कसे गए तंज में बहुत दम है कि राहुल गांधी को पहले राजस्थान में कांग्रेस को जोड़ना चाहिए, भारत तो जुड़ता रहेगा। राहुल गांधी यह भी सोचें कि पायलट जैसे पार्टी को दगा देनेवाले लोगों पर विश्वास जताने के लिए गहलोत जैसे नेताओं के समर्पण को दरकिनार करने से भी कांग्रेस को क्या मिलेगा? इस सबके बीच, राहुल गांधी ने अगर अपने पायलट प्रेम पर अपना स्टैंड नहीं बदला, तो राजस्थान में कांग्रेस की राजनीतिक नौटंकी का पर्दा जल्दी गिरेगा नहीं।</p>
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