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शिवराज पाटिल चाकुरकर .. नेहरु की तरह कपड़ों के शौकीन थे ….

शिवराज पाटिल पर वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर का आलेख

वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर का आलेख

इनको इसलिए चुना कि भारतीय राजनीति के आजादी के बाद के इतिहास में पंडित नेहरु के बाज शिवराज पाटिल चाकूरकर ही ऐसे व्यक्ति दिखायी देते हैं जो केवल आचरण और व्यवहार में ही नहीं कप़ड़ों से लेकर रहन सहन तक हर जगह साफ सफाई और संयम का परिचय देते हैं .उनकी भाषा भी बहुत संयत और हमेशा तोल कर बोलते रहे पाटिल साहेब .. पंडित नेहरु के बारे में तो सुना ही है लेकिन शिवराज पाटिल से बहुत सी बातें करने का मौका मिला.

सन 2004-2008 की यूपीए सरकार के दौरान शिवराज पाटिल देश के गृहमंत्री भी रहे। 26/11 के मुंबई आतंकी हमले के बाद उन्होंने 30 नवंबर, 2008 को देश की सुरक्षा में हुई चूकों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था।

इससे जुड़े ही कुछ किस्से बताता हूं. बहुत कम लोगों को पता होगा कि शिवराज पाटिल असल में लिंगायत थे और वो कर्नाटक की लिंगायत एजुकेशन सोसायटी से बहुत करीबी से जुड़े हुये. वो उन बहुत कम लोगों में से थे जब राजीव गांधी के निधन 1991 के बाद से सोनिया गांधी ने खुद को 10 जनपथ में समेट लिया था और सीताराम केसरी सहित कुछ नेता गांधी परिवार को कांग्रेस से दूर ही रखना चाहते थे तब भी वो नियमित तौर पर जाकर सोनिया गांधी से मिलते थे और गांधी परिवार को हर तरह की मदद के लिए तैयार रहते थे . यहां तक कि सोनिगे या गांधी की राजनीती में एंट्री के लिए वो भी बहुत हद तक कारण रहे उन्होंने ही सोनिया गांधी को कहा था कि वो हर कदम पर साथ देंगे.

शिवराज पाटिल हमेशा से संयमित और अनुशासित रहे हैं. वो बताते थे कि खाना भी कम से कम 32 बार चबाकर खाना चाहिये .इसके लिए वो पूरा समय भी देते थे . चाहे वो पद पर रहे हों या नहीं वो हमेशा लोगों से अपाईंटमेंट देकर ही मिला करते थे . वो हमेशा सफेद या क्रीम कलर की ही शर्ट या पेंट पहनते थे .उनको इस बात की शिकायत रहती थी कि लोग उनके कपड़ों से उनका आंकलन करते हैं काम से नहीं .. जबकि लोकसभा स्पीकर से लेकर गृहमंत्री तक कई अहम कामों में उनका योगदान रहा.

एक बार संसद में वो एक आतंकी हमले की घटना पर जबाब दे रहे थे .. उनकी हिंदी मराठी मिश्रित ही थी .. राज्यसभा में वो जबाव दे रहे थे तो कहने लगे कि हम आतंकियों को कड़ी से कड़ी शिक्षा देंगे .इस पर राज्यसभा में हंगामा हो गया .. तब विपक्ष में बैठी बीजेपी के लोग ये कहकर विरोध करने लगे कि आतंकियों को सजा देने के बजाय पाटिल साहेब उनको शिक्षा देना चाहते हैं. बाद में उनको सफाई देनी पड़ी कि मराठी में शिक्षा का मतलब ही सजा होता है. इस बात पर राज्यसभा में ठहाके गूंजने लगे ..

उनके गृहमंत्री बनने की बात भी बड़ी निराली है .. वो जब 2004 का लोकसभा चुनाव उस्मानाबाद से लड़ रहे थे तब भी वो घऱ घर जाकर प्रचार नहीं करते थे उनका मानना था कि लोगों तक बात पहुंचनी चाहिये चुनाव मैनेजमेंट की जरुरत नहीं ..इतना ही नहीं एक जनसभा में तो उन्होंने कह दिया कि अगर किसी को नौकरी पाने या गली अथवा नाली सुधार की बात करनी हो तो मेरे पास मत आना ..सांसद का काम संसद में नीतिगत चर्चा और कानून बनाना होता है ये जमीनी काम तो विधायक और कारपोरेटर करेंगे मैं उनको फंड दे दूंगा. उनकी इसी बात पर तब के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुरुदास कामत ने मुझे कहा था कि ऐसी बात करेंगें तो पाटिल साहब कहां जीतेंगे ..

ये बात भी बहुत कम लोगों को पता होगी कि पाटिल साहेब को इस बात का इल्म था कि चुनाव जीतने पर अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो उनको ही अगला प्रधानमंत्री बनाया जायेगा .शायद उनको गांधी परिवार से इस बात का संकेत भी मिला हो.. पाटिल साहेब ने चुनाव से पहले ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर तब एनडीटीवी के पत्रकार समीरन वालवेकर की सलाह पर कुछ छोटी फिल्म भी बना रखी थी जिन पर वो अपनी राय दे रहे थे ..वो पीएम बनने की पूरी तैयारी कर रहे थे.लेकिन अपने स्वभाव और साफगोई के कारण चुनाव हार गये .

चुनाव के बाद संसद में जब कांग्रेस विधायक दल की बैठक होने वाली थी जिसमें सारे अधिकार सोनिया गांधी को दिये जाने थे .तो हार जाने के कारण पाटिल उस बैठक में नहीं जा रहे थे तब गुरुदास कामत उनको जबरदस्ती बुलाकर उस बैठक में ले गये… पाटिल साहब भी शायद नजरें नहीं मिला रहे थे और पीछे की कतार में जाकर बैठ गये .. सोनिया गांधी को उनके पीछे होने की बात पता चली तो पाटिल साहब को आगे की कतार में ले जाया गया और कुछ दिन बाद नाटकीय तरीके से जब मनमोहन सिंह को पीएम चुना गया तो दस जनपथ के विश्वासपात्र होने के नाते शिवराज पाटिल को गृहमंत्री बना दिया गया . पाटिल साहब का बंगला भी तब जनपथ पर शऱद पवार के बाजू में ही था. गृहमंत्री होने के नाते उनके घर पर वाच टावर लगा हुआ था तो शरद पवार हम पत्रकारों से अक्सर मजाक में कहते लगता है कांग्रेस ने जानबूझकर उनके बाजू में गृहमंत्री को बंगला दिया ताकि वो नजर रख सकें ..गांधी परिवार के करीबी होने के कारण पाटिल साहब की शरद पवार से नहीं बनती थी .

अब बात 26 नवंबर 2008 के हमले की जब मुंबई के ताज होटल और सीएसटी समेत कई जगहों पर पर हमले हुये तो पाटिल साहेब पर बड़ी जिम्मेदारी आ गयी .. हमले की सुबह ही हम लोग कैमरा लेकर उनके घर पहुंच गये .बड़ी मुश्किल से वो मीडिया पर बाईट देने तैयार हुए . उनके घर तब कोई पूजा थी .करीब आठ बजे वो बाईट देने आये तो क्रीम कलर का बंद गले का कोट पहने हुये थे.. उसके बाद वो हड़बड़ी में नहाने चले गये और आननफानन में पूजा करके निकलने लगे ..मीडिया वहां जमा ही हुआ था . लेकिन तब तक उन्होनें केवल सफेद रंग की शर्ट पहनी थी उसी में वो फिर बाईट देने आ गये.. इसके तुरंत बाद उनको संसद में एक बैठक में जाना था ..वो निकल ही रहे थी कि उनकी बहु अर्चना पाटिल ने उनको ब्राऊन रंग का कोट लाकर दे दिया वो उसे गाड़ी में ही पहनकर पहुंच गये वहां भी कैमरे लगे थे इस बार वो एक नये कोट में दिख रहे थे .. आजतक के दफ्तर में इसे बहुत बारीकी से देख रहे क्राइम रिपोर्टर शम्स ताहिर खान से जोर से चिल्लाकर कहा अरे ये तो फिर कपड़े बदल लिये .. बस इसी बात पर पाटिल ने हमले के दौरान भी बार बार कपड़े बदले ये हेडलाईन चलने लगी जिसका खामियाजा पाटिल को 30 नवंबर को इस्तीफा देकर करना पड़ा

इस हमले से जुड़े कुछऔर किस्से आगे आयेंगे लेकिन पाटिल साहेब पर उस दौरान ये भी आरोप लगाया गया कि हमले के 24 घंटे बाद तक भी वो सेना के कमांडो नहीं भेज पाये जिससे आंतकियों को ताज में और भी हमला करने का मौका मिला. बाद में पाटिल साहब से हमारी बात हुयी तो उन्होंने कहा कि वो संसदीय परंपरा में विश्वास रखते हैं जब तक राज्य सरकार की तरफ से अधिकारिक तौर पर सेना या कमांडो भेजने का आग्रह नहीं मिल जाता तो किसी राज्य में सेना नहीं भेज सकते थे . ये राज्य और संघ के अधिकार और शक्तियों का उल्लंघन होता . राज्य सरकार ने दोपहर तक ही आग्रह भेजा उसके बाद ही दिल्ली से विशेष विमान से कमांडो भेजे जा चुके .

पाटिल साहब को इस बात का हमेशा दुख रहा कि उन्हें बिना किसी वजह से दोषी बताया गया .उनका कहना था कि कुछ लोगों ने इस मौके पर भी जमकर राजनीति की ..यहां तक कि जब हमला चल रहा था तब भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने मुंबई पहुंचकर ताज के पास मीडिया से बात की थी. जबकि हालात खराब थे इसलिए कोई जवाब नहीं दिया गया .कपड़े बदलने और देरी के आरोप के बाद भी पाटिल साहब को इस्तीफा नहीं देना पड़ता लेकिन तब सरकार में शामिल होकर भी मौका देखने वाले शरद पवार ने एक तीर से कई शिकार कर दिये .. उन्होनें तब राज्य के गृहमंत्री आर आर पाटिल को कह दिया कि जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दें .. आर आर आबा ने इस्तीफा दे दिया तो सीएम विलासराव देशमुख को भी इस्तीफा देना पड़ा और इसी दवाब में आखिर शिवराज पाटिल को भी पद छोड़ना पड़ा .

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