करीला कार्निवल" में छिपी हैं पर्यटन की संभावनाएं

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 48 घंटे, 25 लाख लोग, रंगबिरंगे परिधानों में नाचती 25 हजार से ज्यादा जिप्सी युवतियां, मृदंग, टिमकी, नगड़िया, रमतूले, ढोलकियां, ढफलियां, झूले,झांझरें, खड़तालें और स्वांग गाते देहाती वृंद। हंड्रेड पाइपर से लेकर महुए से उतरी देशी शराबों की गंध और मस्ती से भरा लंबा चौड़ा पहाड़ी रकबा ...यह है मध्यभारत का 'राई डांस कार्निवल'! होली के पांच दिन बाद आने वाले हसीन त्यौहार रंगपंचमी को होने वाले इस कार्निवल ने बीते दो सौ साल में अपना यह विशाल आकार लिया है।...एमपी के अशोकनगर जिला मुख्यालय से 24 किमी पर हर साल होने वाला यह आयोजन भले ही किसी को 'टैबू' लगे पर यह है भारत का कल्चरल हेरीटेज।...विशुद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन। यदि कोई  नृत्यांगना़ं और सोबतों द्वारा गाए जाने वाले स्वांगों, छंदों, गीतों को दर्ज कर सके तो उसमें ईसुरी जैसे महान बुंदेली साहित्यकारों की रचनाएं भी मिलेंगी।

इस नायाब आयोजन पर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की निगाहेकरम नहीं पहुंची है वरना यह भी ब्राजील के रियो डी जिनेरियो के सांबा कार्निवल की तरह एक व्यवस्थित उद्योग का रूप ले सकता है। इस अनोखे उत्सव का संक्षिप्त इतिहास समझ लीजिए। दो सौ साल पहले विदिशा जिले के एक गांव से आए साधु तपसी महंत ने करीला की इस पहाड़ी पर एक प्राचीन आश्रम जैसी जगह खोज कर सब को बताया कि यहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था जहां भगवान राम द्वारा परित्यक्त होकर रह रहीं सीता जी के पुत्रों लवकुश का जन्म हुआ था। साधु की इसी जानकारी पर यहां सीता जी, लव कुश और वाल्मीकि का एक मंदिर बनाया गया। (खास बात यह कि रामचंद्र जी प्रतिमाओं में शामिल नहीं हैं)। इसे जानकीमाता मंदिर करीलाधाम का नाम दिया गया।  जल्दी ही इस स्थान ने एक सिद्ध जगह का रूप ले लिया जहां ऐसे लोगों की मनौतियां पूरी होती हैं जिन्हें संतान की आकांक्षा होती है। ऐसे दंपत्ति साल भर आकर अपने हाथों के छापे मंदिर की दीवारों पर लगा कर चले जाते हैं। जल्द ही उनकी मनौती पूरी हो जाती है तब उन्हें रंगपंचमी के दिन आकर बेड़िया समुदाय की नर्तकियों की नृत्य करवाना होता है। (यह मानकर कि लवकुश के जन्म पर स्वर्ग से अप्सराएं उतर कर नृत्य कर रहीं हैं)। ...लेकिन मोटे तौर पर यह फागुन और फसल कटाई के बाद का यह उत्सव लगता है।

यहां स्मरण हो कि इन नर्तकियों को उनका मंहगा शुल्क, वाहन, वादक दल आदि की सारी सुविधाओं सहित यहां लाना होता है। यानि एक मनौती का खर्च  न्यूनतम बीस हजार रु तो होता ही है। बेड़नी नर्तकियां भी करीला के इस जानकीमाता मंदिर में नृत्य करने को एक पुण्य कार्य की भांति लेती हैं। इस तरह उनके लिए यह एक ऐसी कलात्मक उत्सवधर्मी तीर्थयात्रा होती है जिसमें उनकी कमाई भी हो जाती है। ...मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश,राजस्थान और हरियाणा से यहां आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा एक ही दिन में हजारों की तादाद में नर्तकियों को ससम्मान यहां लाया जाता है। आश्चर्य है कि शराब, गांजा, भांग के नशों में धुत्त लाखों  लोगों के बीच भी इस मेले के दिन किसी व्यभिचार या अपराध की कोई खबर नहीं बनती। ढकेछिपे सीमित स्तर के देहव्यापार के आरोपों के साथ जीवन जीने वाली इन नर्तकियों को अपने पेशे से उतनी शिकायत नहीं है जितनी उन्हें दूर से देखने वालों को है।...चंपाबेन जैसी सर्वोदयी कार्यकर्ता ने तो इस समुदाय की महिलाओं के बीच काम करते हुए जीवन ही समाप्त कर लिया लेकिन उनके आंदोलन का असर भी इस समुदाय पर ज्यादा असर नहीं छोड़ सका क्योंकि यह उनकी जीवनशैली है। यहां उल्लेखनीय है कि विश्व भर में फैले जिप्सी समुदाय की तरह बेड़िया समुदाय की जड़ें भी भारत के राजस्थान और गुजरात के भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी हैं। इनके पहनावे, बर्ताव, उन्मुक्त जीवन शैली सारे संसार में लगभग एक जैसी ही है। 

पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक एक बड़े मेले का दर्जा देकर शासन स्तर से इसके इंतजाम करना शुरू किए हैं। मुख्यमंत्री और कई मंत्री इस मंदिर में ध्वज चढ़ाने जाते हैं, बजट देते हैं, इंतजामों का सुपरवीजन करते हैं।मेले में  जिला कलेक्टर और एसपी के पास सड़क, बिजली, पानी, स्वच्छता,कानूनव्यवस्था सुचारू बनाने की जबाबदेही होती है। दो साल पहले किसी समझदार कलेक्टर ने कलाकारों की ड्रेस और मेकअप जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान देना शुरू किया। राई नृत्य को कला के रूप में शासन स्तर पर भी मान्यता है। इस आयोजन को केंद्र बना कर सरकार चाहे तो नर्तकियों के एजूकेशन,हेल्थ, वेलफेयर के भी काम  कर सकती है। इन्हीं में से फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी बेहतर आर्टिस्ट निकल सकते हैं। ...इस साल का आयोजन इसी माह 25 मार्च को है।  

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