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बाढ की संभावनायें सामने हैं

मशहूर कवि दुष्यंत कुमार त्यागी ने लिखा था कि बाढ की संभावनायें सामने हैं और लोग बस्तियां बसाने में लगे हैं .

बिहार के गोपालगंज को जोडने वाले सततरघाट पुल के एक हिस्से का बह जाना बहुत कुछ कहता है. सुशासन बाबू ने बस 16 जून को ही इसका उदघाटन किया था और 26 दिन में ये बह गया. लेकिन सरकार के मंत्री की बेशर्मी देखिये कह रहे है कि पुल नहीं पुल को जोडने वाली पुलिया बही है . अब पीडब्ल्यूडी मंत्री कह रहे है कि पुलिया की मिटटी कट गयी है तेज बहाव में . उनको कौन समझाये कि ये पुल का हिस्सा थी और जब पुलिया से ही नहीं गुजरेंगे तो पुल तक कैसे पहुंचेगे.

नीतिश कुमार ने 8 साल पहले 2012 में इस पुल का शिलान्यास किया था और इतने सालों बाद 264 करोड की लागत से ये प्रोजेक्ट पूरा हुआ जिसमें मुख्य पुल और उसे जोडने वाली अप्रोच रोड पर दो सहयोगी पुलिया बनायी गयी जिससे पुल तक पहुंचा जा सके .इस घटना पर सुशासन बाबू चुप है मंत्री और विभाग पहले ही कह चुका है कि कुछ नहीं हुआ तो जांच का सवाल ही नहीं है .जाहिर है चुनाव की मलाई काटने के लिए पुल फटाफट बना दिया लेकिन मलाई तो ठेकेदार को मिली और सुशासन बाबू की पोल खुल गयी

यहां तक कि एनडीए के सहयोगी चिराग पासवान ने भी कह दिया कि ये जीरो करप्शन की थयोरी पर सवाल उठाता है तो आरजेडी ने साफ कह दिया कि जमकर पैसा खाया गया इसलिए पुल बह गया .

ये पुल चंपारण को भी जोडता था इसलिए चंपारण के समाजसेवी सर्वेश तिवारी कह रहे है कि कम से कम जांच हो और जो जिम्मेदार अफसर और ठेकेदार को पकडा जाये . उनसे ठेके की राशि वसूल कर फिर से पक्का पुल बनाने की बात तो हो लेकिन सरकार को मानने तक तैयार नहीं जांच तो दूर की बात है .

जाहिर है चुनाव से ठीक पहले इस पुल का ढहना नीतिश के चुनावी सफर पर ब्रेक लगा सकता है. चुनाव में इस पुल का उललेख बार बार सुनाई देगा .

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